पीपल जाते कह गया, मुझसे अपनी बातकोई भी बैठा नहीं, इन दिवसों मेरी छाँव? भूल गए मैना गौरैया, खो गया कलरव शोरभूल गई काली कोयल भी, भूल गए सब मोर? पनघट भी है रूठ गया, लेता मुंह को फेरनदिया भी पास नहीं, मांझी न गाता टेर। गोधूली भी स्वप्न हो गईं, दिखे न कोई ढोरचरवाहे अब भूल गए हैं आना ही इस ओर। भूल गए हैं मर्कट भी, उछलें डाली पर जोरभूले सारे विहग वृन्द भी जो थे फल के चोर? मुझसे आकर मिलने वाली पीढ़ी है...