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वक्त

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मुश्किलों का दौर भी आखिर तो गुजर जाएगावक्त से भागकर कोई शख्स किधर जाएगा? धूप हो, छांव हो या तूफान सफर में आएखत्म हो जाएगा जो हालात से डर जाएगा। राह चलते हुए कदमों की थकन भूल गएजूझने से ही तो सीरत पे असर आएगा। अंधेरी रात में चरागों का असर देखो तोतमस के बढ़ते ही वो और निखर जाएगा। जगनुओं ने भी अपने नाम को जिंदा रखाबन गए रौशनी, पैग़ाम को जिंदा रखा। बहुत दिन बैठा तो लोहे की चमक जाती रहीमुश्किलें ना...

स्वप्न

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तुम कोई भी स्वप्न देख लोपर कर्म तो करना पड़ेगाकिसी भी दीप की तरहहर रात को जलना पड़ेगा। ये यूं नहीं कि कोई भीआ कर मिसाल बन गयाये यूं नहीं कि कोई भीआ शिखर पर चढ़ गया। ये यूं है कि दीपक में भीएक बाती है सदा जलीये यूं है कि इस राह परश्रम से ही मंजिल मिली। कितने ही लोग कर्मरतबस स्वेद में पिघल गएकितने ही अपने कर्म सेयह जिंदगी बदल गए। बहुत घना तिमिर था वोपर जुगनू जब चमक उठेवो रात मुझ्को याद हैजब अंधकार...

चरैवेति चरैवेति

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जिंदगी के इतने वसंत देखने के बाद यह सूक्ति अच्छे से समझ में आई! इसके पूर्व में तो न समय था न विवेक! हमारा अनुभव ही तो आदमी बनाता है, और जब यह बात समझ में आती है तो लगता है कि बहुत कुछ हमारे हाथ से निकल गया जो फिर वापस नहीं आ सकता! जीवन के रास्ते पर हम सभी इतने आगे निकल चुके होते हैं कि अब जो निकल चुका उसे आप फिर जी नहीं सकते, हां आगे का प्रारब्ध अवश्य सुधार सकते हैं जो इस सूक्ति का मंतव्य है! अब...

बरगद से बोनसाई

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सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के दौर से गुजरते हुए हम सब कहां से कहां आ चुके हैं। प्रगतिशील लोग खुश हैं क्योंकि उन्होंने गांव जैसी इकाई के टुकड़े-टुकड़े कर दिए हैं और उनकी विजय पताका जगह-जगह चौक चौराहों पर बड़े-बड़े लैंप पोस्ट, फव्वारे एवं गगनचुंबी इमारतों के रूप में फहरा आ रही है। अब शहर ही आदमी का सबसे बड़ा ठिकाना है, हर आदमी गांव से शहर की ओर भाग रहा है, कभी ना पूरे हो सकने वाले सपनों की तलाश...

संसार

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यह प्यारा मधुमय सा संसारप्रात खोले है मन का द्वारदिवस भर खुशियों का अंबाररात को तारों में घर बार। क्षितिज जब उगता है सोनानींद छोड़े हैं हर कोनाकूकते कलरव करते खगकिरण से जगमग होता जग। फूल खिल उठते हैं सारेअंगड़ाई लेती हैं कलियांखुशबू फैल रही हर ओरजहां मदमस्त हो गए मोर। सुबह की भीगी यह खुशबूबुलाती मुझको अपने पासपुष्प पर भ्रमरो की अनुगूंजलगता है आया ज्यों मधुमास। फैलती महुए की चादरटपा टप पेड़ों के...

महफिल

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कहीं सूरज दिखा दिया हमनेकहीं पर शाम कर डालीबस अपने चंद शेरों सेहर महफिल गुलाम कर डाली। हर दिन फूल खिले मिलते हैंहर एक रात रातरानी हैजब से तुम पास मेरे बैठ गएअब तो दुश्मन भी गले मिलते हैं। तेरे ही नाम जिंदगी कर लीतुम्हें ही चारागर सा मान लियाजब अंधेरों से मुलाकात हुईतुझसे ही रोशनी कर ली। प्यार का फलसफा ही ऐसा हैमेरे गीतों में आशनाई हैआधा मिसरा ही कहा है मैंनेउसके होठों पर हंसी आई है। एक दिन गिरा...

जगेसर

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ट्रिन! ट्रिन! ट्रिन! ट्रिन,! ट्रिन! ट्रिन! अचानक फोन की घंटी बज उठी। प्रो मकरंद त्रिपाठी चौंक कर उठे। रात के तीन बज रहे थे। इस समय कौन हो सकता है, सोचकर उनका मन चिंतित हो उठा, फोन उठाया तो जगेसर के बेटे चंदू का फोन था। चंदू लगातार रोए जा रहा था। उन्हें लगा जरूर कुछ अशुभ हुआ है। पूछा, “अरे चंदू, बता क्या हुआ?” उसने उन्हें जगेसर के देहांत की सूचना दी। उन्हें सुनकर बड़ा कष्ट हुआ, सहसा एक...

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Prof. Vachaspati Dwivedi teaches English in Sant Vinoba P.G. College, Deoria, U.P. India. He is a PhD from India's reknowned University BHU, Varanasi with a first class Post-graduate degree. His foreign tenures took him to teach in Haramaya University, Ethiopia and Al Fateh University Tripoli, Libya. He has 8 books to his credit and more than 30 papers published in different journals, both national and international. In 2012 he presented a paper on Folk Literature in Bangkok International Conference , Thailand and in Feb 2019 he went to Singapore to present a paper on Hijra Autobiographies. He edits an international online journal 'Critical Paradigm' which can be accessed at www.criticalparadigmjournal.com.
He is an acclaimed poet of Hindi as well and has published three poetry collections namely 'Ret ke Sahar Me', 'Phir Khilenge Fool Priytam' and 'Jindagi Jo Shayari Hoti'. Recently his story collection 'Apna Apna Moksh' (2024) has been published worldwide and is available on Amazon and Flipkart.