उन वंचितों पर भी जरा कोई गज़ल तो लिखझोपड़ी का हक जो मारे उस महल पर लिख। लबों, जुल्फों, सागरों पर शायरी आसान हैज़ुल्मतों के दौर पर भी एक बहर तो लिख। भूखे नंगे लोग किस उम्मीद से सजदा करेंअदालतें कानून हों गर बेअसर तो लिख। चांदनी पर शेर लिख जलती दुपहरी भूलतेसपने जहां पूरे न हों ऐसे बसर पर लिख। प्याला लिए साकी के साए में थिरकना चाहनाये भी भला कोई काम है अच्छा अगर तो लिख? दूसरे की आंख में आंसू का कतरा...
अक्सर भूल जाता हूं
क्या खूब झगड़ा आजकल सजदाघरों का हैमैं जब भी सिर झुकाता हूं ये अंतर भूल जाता हूं। मुझे मस्जिद कलीसे भी किसी मंदिर से लगते हैंमैं उनको देखकर खुद अपना मज़हब भूल जाता हूं? है मालिक कौन दुनिया का भला मैं पूछता क्यों हूं?कि यह भी उसकी मर्जी है मैं अक्सर भूल जाता हूं। खड़ा मैं जब भी होता हूं किसी सच के शिवाले मेंलगे किस रंग के झंडे मै अक्सर भूल जाता हूं। सियासत जो भी कहती हो, हूं मैं भी आदमी आखिरहिदायत...
चराग़
जब एक चराग़ बुझ गया तूफान हंस पड़ाउसने समझा अब कहीं चराग़ नहीं। जगनुओं को देकर कसम चराग़ों नेअंधेरी राह पर फिर से उजाले कर दिए। वो उजालों का निगहबान होता जाएगाजो अंधेरों में पशेमान होता जाएगा। बस एक ज़ुबान की चाहत है इन उजालों कोअंधेरे देर तक मेहमान नहीं होते हैं। थर थर कांप रही है लौ, पर जिंदा हैदेर तक वो भी अंधेरों का भरम रखती है। तुम चराग़ न सही, जुगनू ही चलो हो जानाजिसमें न तेल है, न दिया है, न...
जिंदगी
जा के फिर जिंदगी नहीं आईवो गई और फिर नहीं आई। हर शहर ढूंढ लिया हर मोड़ पे तलाशा उसकोजो खुशबू पास से गुजरी, फिर नहीं आई। उसका मधुमास सा आना मेरे पतझड़ मेंवैसी पछुए में पुरवाई, फिर नहीं आई। अब तो खुशबू के सारे शहर जैसे रीत गएमहक कुछ ऐसी करिश्माई, फिर नहीं आई। प्यास बढ़ती ही रही पर वो प्याला न मिलाप्यार में ऐसी तवानाई, फिर नहीं आई। मौसमों का भी कोई रंग न देखा ऐसावैसी सर्दी में गरमाई, फिर नहीं आई।...
कोहरा
मानता हूं कि अब कोहरा घना हैमगर चुप बैठने से क्या बना है? घर से निकल कुछ कर के देखोअंगीठी सेकने से क्या बना है? महज संघर्ष ही है राह वत्सलचुपचाप बैठे सोचने से क्या बना है? लड़ेंगे जूझेंगे कठिनाइयों सेसिर्फ अंगड़ाईयों से क्या बना है? जो कहते हैं कमजोर तुमकोउनके कहने भर से क्या बना है? बेमन हो के तुम कुछ भी न करनाकर्म को त्यागने से क्या बना है? अमावस भी तो अक्सर जगनुओं से हारती हैनियति से हार को...
जो न मिला सोचकर के क्या होगा?
जो न मिला सोचकर के क्या होगा?एक नए गम का सिलसिला होगा। मंजिलें और भी तो हैं मुमकिनआदमी और भी रवां होगा। फूल गर गिर गए हैं शाखों सेपुष्परज वहीं पर गिरा होगा। चमन में फ़स्ल-ए-गुल के आते हीनई कलियों का सिलसिला होगा। लकीरें खींच ले नई खुद हीलकीरें खोजने से क्या होगा? रंज का वक्त कबका बीत गयाजख्म की सोचने से क्या होगा? अंधेरे जगनुओं से हार गएरौशनी खोजने से क्या होगा? राह पर आगे को कदम तो बढ़ासिर्फ बस...
रौशनी
जहां तक रौशनी नहीं जातीवहां भी मेरी गजल जाएहौसले मेरे कम नहीं होगेभले ताउम्र यह सफर जाए। रोज ही एक नए फसाने काअजीब शौक है तुझकोलिख दूं मैं तुझ पर शेर कोईतेरा नकाब ही उतर जाए। चलो कुछ आग छुपी रहने दूंइश्क भी, रंज भी अपनाकुछ दिनों बाद देखेंगेकहां क्या-क्या लिखा जाए? मैं बहुत दूर निकल आयाजैसा उसने मुझसे चाहा थाअब तो पिछला मरहला मुझकोज़रा ज़रा सा ही बसर आए। अब कलम है, चंद गजलें हैंमैं ही उस्ताद हूं...
मुकाम
बहता रहा सदा ही नदी की धार में जैसेकुछ हाथ में था ही नहीं पतवार के जैसे। करता रहा सफर एक अनजानी डगर परजिस राह पर कोई न निकला था बसर पर। तिनका हूं मेरे हाथ में कुछ भी तो नहीं हैनजरों में दूर दूर तक कोई भी नही है। बस मान लिया मैने कि तू साथ खड़ा हैतबसे मेरा अंदाजे-बयां सबसे जुदा है। मालूम नहीं पंक्तियां ये कौन लिख रहाचुपचाप खड़ा देखता कागज़ सिमट रहा। कोई गज़ल भी मुझमें है सोचा ही नहीं थाएक गीत कभी...
मिल्कियत
कितने बदल गए हम भीप्यास ही जिंदगी कर लीमौसम से रंज कर बैठेऔर फूलों से दोस्ती कर ली। क्या मिला, न मिला, देखे कौन?कौन इतना हिसाब कर डालेहै फुर्सत किसे जो वणिकों साअपना मिज़ाज कर डाले? जफ़ा वाले सोच में रहतेकि पत्थर का जवाब पत्थर हैमैंने रिवायत पलट कर रख डालीफूलों में जवाब कर डाला। लगा लो मिल्कियत का हिसाबमैंने पलड़े ग़ज़ल को रख डालातुम जो चाहो तुम रख डालोमैंने अपनी शग़ल को रख डाला। अब देखें कहां ले...
मरासिम
जिंदगी सरपट गुजरती जा रही हैजैसे कोई हो रेलगाड़ीआ भी रहे हैं लोगजा भी रहे हैं लोगहर आदमी अपने मरासिम जी रहा है।
सभी जल्दी में कितने आजकल हैं?रिश्ते भी दूरभाषी हो गए हैंइच्छाएं स्वप्न में अब ढल रहीं हैंदूरियां तो मिट गईं भूगोल कीपर उम्मीदें कितनी खाली हो गईं हैं।
सुबह से शाम तक हम राह तकतेकहीं मुस्कान में छल हैकहीं पहचान दुर्बल हैएक दूसरे से अब किनारा हो गया हैआदमी टूट कर कितना बेचारा हो गया है।