यहीं एक बरगद हुआ करता था, पहलेहम उसकी छांव में खेले थे, पहले। गर्मियों में तो यहां घर का वहम होता थाघर यहां कम ही थे वैसे भी, पहले। पक्षियों ने भी यहीं नीड़ का निर्माण कियायहीं फल भी गिरा करते थे, पहले। हम कितने खुश थे जरा धूप और छाया मेंलोग भी कितने जुड़े थे, पहले। जड़ें ऊपर से नीचे को लटक आती थींवहीं वृक्ष भी बन जाती थीं, पहले। कैसा बदला ये जमाना कि बरगद न रहाजाने किस दर्द से गुजरा था, पहले।...