कितने बरस कितने ही दिन और कितनी रातें बीत गईं
फिर भी अपनी प्यास मिटी ना, ना तृष्णा पर जीत हुई।
अब भी आंखों में इंद्रधनुष है अब भी सपने देख रहा
अब भी प्यालों की आस लगी है नव मधुशालाएं खोज रहा।
हर मधुशाला बारी बारी रोज ही जाकर पूछता है
मोक्ष जहां पीने से मिलता वो मधुशालाएं कैसी हैं?
अब तक जिसका स्वाद न पाया वह रस भी तो पीलूं मैं
दे दो मुझको ऐसा प्याला जिसको पी सब भूलूं मैं।
सुख औ दुख के अंतराल में भटका मन बारी बारी
संबंधों के मोहजाल में अक्सर पल होते भारी।
सारी दुनिया खोजा फिर भी वह अमृत कोई पा न सका
तृप्ति मिली हो जिस मधु से वह मधु भी कोई ला न सका।
मैं भी प्यासा हूं तुम भी प्यासे, प्यासा ही सारा जग है
तृप्ति न मिलती कहीं भले ही मधुशालाएं पग पग हैं।
जीवन का आनंद यही सब मधु ही मधु चिल्लाते हैं
प्यासा फिर भी प्यासा रहता प्यालों से प्याले टकरातें हैं।
पीने के दिन, पीने की रातें, पीने में जीवन बीत गया
जीवन का हर रस पी ले पतझड़ तो कबका बीत गया।
यही प्यास जीवन का अमृत ये ही अपना सहचर है
प्यारा प्यारा साकी है और मन यह अपना मधुकर है।