पीपल जाते कह गया, मुझसे अपनी बात
कोई भी बैठा नहीं, इन दिवसों मेरी छाँव?
भूल गए मैना गौरैया, खो गया कलरव शोर
भूल गई काली कोयल भी, भूल गए सब मोर?
पनघट भी है रूठ गया, लेता मुंह को फेर
नदिया भी पास नहीं, मांझी न गाता टेर।
गोधूली भी स्वप्न हो गईं, दिखे न कोई ढोर
चरवाहे अब भूल गए हैं आना ही इस ओर।
भूल गए हैं मर्कट भी, उछलें डाली पर जोर
भूले सारे विहग वृन्द भी जो थे फल के चोर?
मुझसे आकर मिलने वाली पीढ़ी है खामोश
खेले कल तक मेरी छांव में, अब उल्टी उनकी सोच।
विस्मृति की फैली बीमारी, भूले सब इतिहास
भारत की अनमोल सभ्यता आज बनी परिहास।
ऋषि बैठे थे मेरी छाँव में, चिंतन में तल्लीन
कितने बुद्ध औ महावीर भी आए युग प्राचीन।
धर्मों की सारी नव धाराएं, फैली लंका और चीन
देश रहे परदेश रहे, सब बनी सृजन की नींव।
डालियों की अब ताकत कम है, पत्तियां हो गईं श्वेत
कोई जड़ ना वृक्ष बनेगी, जब फैली गई है रेत।
किनके खातिर रहूं यहां पर, यही समय का फेर
किसकी खातिर रुकूं धरा पर, आई विदा की बेर?
घर से कोई ना बाहर निकले, हर तरफ छा रहा मौन
जिसने पाला था साँसें देकर, उसे याद करेगा कौन?
विदा अब करो मेरे परिजन, चलूं मुक्ति की ओर
दिवसों से राहें तकते है टूटी मन की डोर।
पीपल जाते कह गया, मुझसे अपनी बात
कोई भी बैठा नहीं, इन दिवसों मेरी छाँव?