मुश्किलों का दौर भी आखिर तो गुजर जाएगा
वक्त से भागकर कोई शख्स किधर जाएगा?
धूप हो, छांव हो या तूफान सफर में आए
खत्म हो जाएगा जो हालात से डर जाएगा।
राह चलते हुए कदमों की थकन भूल गए
जूझने से ही तो सीरत पे असर आएगा।
अंधेरी रात में चरागों का असर देखो तो
तमस के बढ़ते ही वो और निखर जाएगा।
जगनुओं ने भी अपने नाम को जिंदा रखा
बन गए रौशनी, पैग़ाम को जिंदा रखा।
बहुत दिन बैठा तो लोहे की चमक जाती रही
मुश्किलें ना हों तो इंसान भी जंग खाएगा।
गिरकर उठते हुए ही लोग रवादार हुए
उन्हीं से सीख यहां लोग वफादार हुए।
किसी एक रोज तो बंजर में भी बारिश होगी
वक्त बदलेगा हर ओर नवाज़िश होगी।
पानी के जोर से पत्थर पे निशां हो जाता
जूझने वालों का तूफां पे असर हो जाता।
वक्त तो रोज ही बदले है जरा अपनी रंगत
किसे मालूम है कल किस रूप में ढल जाएगा?
मुश्किलों का दौर भी…