अबकि गरमियां पड़ि गइल भारी
बरखा के तनिको ना आइल फंकारी
हो धाने के रोपवा जरि गइलें सारी
पछुआ के जैसे कौनो भइल बा बेमारी
कारी बदरिया से पूछीले हम
हमरे गऊंआं में काहे बरसलू तू नाहिं?
रोवेलें किसान भरि अंखिया में पानी
खइहें पहुंनवां का, का खइहें जवारी
बेटी के बियाह कइसे करइहें मुरारी
खइहें सवंगवा का, का खइहें भिखारी?
कारी बदरिया से पूछीले हम
हमारे गऊंआं में काहे बरसलू तू नाहिं?
चिरई-चुरुंग जाने कइसे जियेलें?
कवने तलइया के पानी पियेलें?
कइसे दुपहरिया गुजारेलें राही?
न पानी मिले ना मिले तनिको छांहिं
कारी बदरिया से पूछीले हम
हमरे गऊंआं में काहे बरसलू तू नाहिं?
अबकि त अमवो से डाढ़ि ना भरल
ना अंचरवे परल ना अमावट बनल
जामुन के बगिइचा में मनवां दुखल
ऊ फरेनिया बिना सब उदासे कटल
हो धाने के रोपवा जरि गइलें सारी
काहे बरखा के तनिको आइल ना फंकारी?
कारी बदरिया से पूछीले हम
हमारे गऊंआं में काहे बरसलू तू नाहिं?
अबकी गरमियां पड़ि गईल भारी…