यहीं एक बरगद हुआ करता था, पहले
हम उसकी छांव में खेले थे, पहले।
गर्मियों में तो यहां घर का वहम होता था
घर यहां कम ही थे वैसे भी, पहले।
पक्षियों ने भी यहीं नीड़ का निर्माण किया
यहीं फल भी गिरा करते थे, पहले।
हम कितने खुश थे जरा धूप और छाया में
लोग भी कितने जुड़े थे, पहले।
जड़ें ऊपर से नीचे को लटक आती थीं
वहीं वृक्ष भी बन जाती थीं, पहले।
कैसा बदला ये जमाना कि बरगद न रहा
जाने किस दर्द से गुजरा था, पहले।
धीरे धीरे सभी दरख़्त हमसे रूठ गए
अपने रिश्ते कभी बिगड़े न थे, पहले।
तुम उसकी छांव में बैठोगे तभी जानोगे
कैसे बरगद थे, कैसे पीपल थे, पहले?
यहीं एक बरगद हुआ करता था, पहले…