कल स्नातकोत्तर प्रथम वर्ष के छात्र सागर पांडेय के एक प्रश्न ने मुझे चौंका दिया। उसने पूछा, “सर, लॉर्ड मैकाले की मिनट तो अठारह सौ पैंतीस की है, फिर आज भी लोग उस को बुरा भला क्यों कहते हैं, क्या वह अभी भी कोई भूमिका निभा कर रहा है अपनी शिक्षा नीति में?” अचानक पूछे गए प्रश्न से मैं थोड़ा चिंतित तो हुआ लेकिन मुझे उसकी जिज्ञासा को शांत करने के लिए कुछ तो कहना था। अतः मैंने उससे कहा, “अब यह सवाल...
पहला विश्वगुरु
अभी-अभी स्नातकोत्तर अंग्रेजी की कक्षा से ग्रीक दार्शनिक एवं आलोचक लोंजाइनस की सब्लाइम थ्योरी पढ़ा कर लौटा था। सब्लिमिटी की व्याख्या करते समय मैंने उनसे कुछ शब्दजालों की बात की जो अक्सर आलोचक दे दिया करते हैं और फिर उस पर लंबी लंबी बहस और चर्चाएं शुरू हो जाती है। लोंजाइनस अलंकार शास्त्र में सब्लाइम के द्वारा एक ऐसी स्थिति को परिभाषित कर रहा था जब भाषा एक ऐसे स्तर पर पहुंच जाए जहां पर उसकी...
अपना अपना मोक्ष
प्रोफेसर शिवकुमार अपने विभाग में अपने अगले व्याख्यान की तैयारी कर रहे थे। कुछ परेशान भी लग रहे थे तभी विभागाध्यक्ष ने कक्ष में प्रवेश किया। “नमस्कार बंधु, कैसे हैं? सब कुशल तो है न? उन्होंने पूछा।न जाने कैसे उन्होंने प्रोफेसर शिवकुमार के चेहरे पर अंकित परेशानी की रेखाएं पढ़ ली थीं। “नमस्कार, सब ठीक है सर, आप कैसे हैं?” प्रोफेसर शिवकुमार ने पूछा। “मैं भी ठीक हूं, क्लास कब है?” “बस, इसके बाद।” “अरे...
चरैवेति चरैवेति
जिंदगी के इतने वसंत देखने के बाद यह सूक्ति अच्छे से समझ में आई! इसके पूर्व में तो न समय था न विवेक! हमारा अनुभव ही तो आदमी बनाता है, और जब यह बात समझ में आती है तो लगता है कि बहुत कुछ हमारे हाथ से निकल गया जो फिर वापस नहीं आ सकता! जीवन के रास्ते पर हम सभी इतने आगे निकल चुके होते हैं कि अब जो निकल चुका उसे आप फिर जी नहीं सकते, हां आगे का प्रारब्ध अवश्य सुधार सकते हैं जो इस सूक्ति का मंतव्य है! अब...
बरगद से बोनसाई
सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के दौर से गुजरते हुए हम सब कहां से कहां आ चुके हैं। प्रगतिशील लोग खुश हैं क्योंकि उन्होंने गांव जैसी इकाई के टुकड़े-टुकड़े कर दिए हैं और उनकी विजय पताका जगह-जगह चौक चौराहों पर बड़े-बड़े लैंप पोस्ट, फव्वारे एवं गगनचुंबी इमारतों के रूप में फहरा आ रही है। अब शहर ही आदमी का सबसे बड़ा ठिकाना है, हर आदमी गांव से शहर की ओर भाग रहा है, कभी ना पूरे हो सकने वाले सपनों की तलाश...
सुधर जाइए
अभी भी समय है सुधर जाइएबहुत लंबा सफर है सुधर जाइए।
देख लो लालिमा पूर्व में दिख रहीजल्द होता सहर है सुधर जाइए।
आंधियां कब रही किसी कैद मेंरात अंतिम पहर है सुधर जाइए।
नफरत की खेती बुरी चीज हैबीत जाए न खुद पर सुधर जाइए।
यह माना नशे में है ताकत बहुतपर जल्दी उतरता सुधर जाइए।
जाने कितने घरौंदे यूं ही टूटतेदर्द देता कहर है सुधर जाइए।
तल्ख़ियां कब तलक गूंजती रह गईउसकी सब पर नजर है सुधर जाइए।
फेक न्यूज
आजकल फेक न्यूज बहुत चर्चा में है। ‘फेक देना’ कुछ दिनों पहले तक क्रिया हुआ करता पर अब ‘फेक’ शब्द का एक विशेषण के रूप में भी प्रयोग होने लगा है। वैसे न्यूज भी पहले न्यूज ही हुआ करती थी। न्यूज पाने के बहुत से साधन हैं जैसे रेडियो, टेलीविजन और गपशप। ये तीनों साधन बहुत पहले से हमारे जीवन में हैं। इनमें रेडियो और गपशप या बतकही सबसे प्राचीन। रेडियो हमारे बचपन का साथी है पर अब वह...
ये उलझनों के साए
ये उलझनों के साए जब भी हैं मन पे छाएहैं मुश्किलें सिखातीं कि कैसे कदम बढ़ाएं? अंधेरी सी उस डगर पर हो कोई न साथ तेरेफिर भी है राह मुमकिन जगनुओं ने सिखाए। डरना नहीं कभी तुम अनजाने रास्तों परबस हिम्मतों ने कितने सफर खुशनुमा बनाए। चलना तो होगा सबको हो वसंत या मरू होपर जीतता वही है जो आगे को बढ़ता जाय। बंजर सी रेत पर मैं ये गज़ल लिख रहा हूंहंसकर जो मुझसे कहती आ तुझको आजमाएं? एक शेर मेरा रख लो इस राह...
गांव बचा कर रखना
शहर में तो आ गए होपर गांव बचा कर रखनागर्मी यहां बहुत हैतुम छांव बचा कर रखना। वहां लगते थे कभी मेलेयहां रोज ही है मेलातुम इनमें खो न जाओये भाव बचा कर रखना। छलिया हैं सब यहां परये चकाचौंध रोशनी भीउजालों के पीछे छुपकरहै अंधेरों ने रहजनी की। चलना यहां संभलकरलुटते हैं रोज कितनेखाकर हजार धोखे भीस्वभाव बचा कर रखना। माटी ही आदमी हैसोंधी है जिसकी खुशबूयह शहर है बनावटआधार बचा कर रखना। झोली भले रहे...
जो नहीं खिले थे गुल कभी
जो नहीं खिले थे गुल कभीवो भी इस बहार में खिल गएजब तुम हो मुझको आ मिलेमेरे अंदाज ही हैं बदल गए। जो उजाले मेरी राह परकभी भूल कर भी गए नहींवो हैं खुद ही आकर पूछतेकि हम किधर को निकल गए? जो पहले थी आवारगीवो है ताजगी में बदल गईजो भी जिंदगी से मलाल थेवो रफ्ता रफ्ता संवर गए। जो थे सहमे सहमे थके थकेउन हौसलों में उड़ान हैजो भी गमों के दयार थेवो गज़ल बन के निखर गए। अब दश्त क्या, खिजां है क्या?मुझे कोई भी...