Taghindi

अपना अपना मोक्ष

प्रोफेसर शिवकुमार अपने विभाग में अपने अगले व्याख्यान की तैयारी कर रहे थे। कुछ परेशान भी लग रहे थे तभी विभागाध्यक्ष ने कक्ष में प्रवेश किया। “नमस्कार बंधु, कैसे हैं? सब कुशल तो है न? उन्होंने पूछा।न जाने कैसे उन्होंने प्रोफेसर शिवकुमार के चेहरे पर अंकित परेशानी की रेखाएं पढ़ ली थीं। “नमस्कार, सब ठीक है सर, आप कैसे हैं?” प्रोफेसर शिवकुमार ने पूछा। “मैं भी ठीक हूं, क्लास कब है?” “बस, इसके बाद।” “अरे...

चरैवेति चरैवेति

जिंदगी के इतने वसंत देखने के बाद यह सूक्ति अच्छे से समझ में आई! इसके पूर्व में तो न समय था न विवेक! हमारा अनुभव ही तो आदमी बनाता है, और जब यह बात समझ में आती है तो लगता है कि बहुत कुछ हमारे हाथ से निकल गया जो फिर वापस नहीं आ सकता! जीवन के रास्ते पर हम सभी इतने आगे निकल चुके होते हैं कि अब जो निकल चुका उसे आप फिर जी नहीं सकते, हां आगे का प्रारब्ध अवश्य सुधार सकते हैं जो इस सूक्ति का मंतव्य है! अब...

बरगद से बोनसाई

सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के दौर से गुजरते हुए हम सब कहां से कहां आ चुके हैं। प्रगतिशील लोग खुश हैं क्योंकि उन्होंने गांव जैसी इकाई के टुकड़े-टुकड़े कर दिए हैं और उनकी विजय पताका जगह-जगह चौक चौराहों पर बड़े-बड़े लैंप पोस्ट, फव्वारे एवं गगनचुंबी इमारतों के रूप में फहरा आ रही है। अब शहर ही आदमी का सबसे बड़ा ठिकाना है, हर आदमी गांव से शहर की ओर भाग रहा है, कभी ना पूरे हो सकने वाले सपनों की तलाश...

सुधर जाइए

अभी भी समय है सुधर जाइएबहुत लंबा सफर है सुधर जाइए।

देख लो लालिमा पूर्व में दिख रहीजल्द होता सहर है सुधर जाइए।

आंधियां कब रही किसी कैद मेंरात अंतिम पहर है सुधर जाइए।

नफरत की खेती बुरी चीज हैबीत जाए न खुद पर सुधर जाइए।

यह माना नशे में है ताकत बहुतपर जल्दी उतरता सुधर जाइए।

जाने कितने घरौंदे यूं ही टूटतेदर्द देता कहर है सुधर जाइए।

तल्ख़ियां कब तलक गूंजती रह गईउसकी सब पर नजर है सुधर जाइए।

फेक न्यूज

आजकल फेक न्यूज बहुत चर्चा में है। ‘फेक देना’ कुछ दिनों पहले तक क्रिया हुआ करता पर अब ‘फेक’ शब्द का एक विशेषण के रूप में भी प्रयोग होने लगा है। वैसे न्यूज भी पहले न्यूज ही हुआ करती थी। न्यूज पाने के बहुत से साधन हैं जैसे रेडियो, टेलीविजन और गपशप। ये तीनों साधन बहुत पहले से हमारे जीवन में हैं। इनमें रेडियो और गपशप या बतकही सबसे प्राचीन। रेडियो हमारे बचपन का साथी है पर अब वह...

ये उलझनों के साए

ये उलझनों के साए जब भी हैं मन पे छाएहैं मुश्किलें सिखातीं कि कैसे कदम बढ़ाएं? अंधेरी सी उस डगर पर हो कोई न साथ तेरेफिर भी है राह मुमकिन जगनुओं ने सिखाए। डरना नहीं कभी तुम अनजाने रास्तों परबस हिम्मतों ने कितने सफर खुशनुमा बनाए। चलना तो होगा सबको हो वसंत या मरू होपर जीतता वही है जो आगे को बढ़ता जाय। बंजर सी रेत पर मैं ये गज़ल लिख रहा हूंहंसकर जो मुझसे कहती आ तुझको आजमाएं? एक शेर मेरा रख लो इस राह...

गांव बचा कर रखना

शहर में तो आ गए होपर गांव बचा कर रखनागर्मी यहां बहुत हैतुम छांव बचा कर रखना। वहां लगते थे कभी मेलेयहां रोज ही है मेलातुम इनमें खो न जाओये भाव बचा कर रखना। छलिया हैं सब यहां परये चकाचौंध रोशनी भीउजालों के पीछे छुपकरहै अंधेरों ने रहजनी की। चलना यहां संभलकरलुटते हैं रोज कितनेखाकर हजार धोखे भीस्वभाव बचा कर रखना। माटी ही आदमी हैसोंधी है जिसकी खुशबूयह शहर है बनावटआधार बचा कर रखना। झोली भले रहे...

जो नहीं खिले थे गुल कभी

जो नहीं खिले थे गुल कभीवो भी इस बहार में खिल गएजब तुम हो मुझको आ मिलेमेरे अंदाज ही हैं बदल गए। जो उजाले मेरी राह परकभी भूल कर भी गए नहींवो हैं खुद ही आकर पूछतेकि हम किधर को निकल गए? जो पहले थी आवारगीवो है ताजगी में बदल गईजो भी जिंदगी से मलाल थेवो रफ्ता रफ्ता संवर गए। जो थे सहमे सहमे थके थकेउन हौसलों में उड़ान हैजो भी गमों के दयार थेवो गज़ल बन के निखर गए। अब दश्त क्या, खिजां है क्या?मुझे कोई भी...

पुनर्मूषको भव

महर्षि याज्ञवल्क्य के वंश में आज पहली बार एक पुत्री ने जन्म लिया था। सभी ओर प्रसन्नता थी और महर्षि याज्ञवल्क्य के प्रपौत्र अपनी पुत्री को अपनी गोद में लेकर दुलार रहे थे। उनकी पत्नी सुमेधा भी बहुत प्रसन्न थी क्योंकि महर्षि याज्ञवल्क्य के वैकुंठ जाने के बाद अब जाकर तीसरी पीढ़ी में किसी पुत्री ने जन्म लिया था। महर्षि याज्ञवल्क्य ने तो एक चुहिया को ही अपनी पुत्री बनाकर उसका विवाह किया था, आपको याद ही...

आदत

कविता जा रही हैपुस्तकें भी जा रही हैंतुमको हो गई आदतअब मसाले की। संस्कृति भी जा रही हैधर्म भी जा रहे हैंफिक्र किसको हैअब रीति-रिवाजों की? गीत की सांस टूटीकथाकारी तिरस्कृत हैतुमको हो गई है आजचिंता बस निवाले की। लोक भाषाएं हमारीगुड़ की चाशनी सीतुमको हो गई आदतअलग सा गुनगुनाने की। रचना सिमटकर पुस्तकों मेंचंद सांसे गिन रही हैतुमको हो गई आदतनजरें चुराने की। सभ्यताएं मिट गई कितनीइसी तरह, धीरे धीरेतुमको...

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Prof. Vachaspati Dwivedi teaches English in Sant Vinoba P.G. College, Deoria, U.P. India. He is a PhD from India's reknowned University BHU, Varanasi with a first class Post-graduate degree. His foreign tenures took him to teach in Haramaya University, Ethiopia and Al Fateh University Tripoli, Libya. He has 8 books to his credit and more than 30 papers published in different journals, both national and international. In 2012 he presented a paper on Folk Literature in Bangkok International Conference , Thailand and in Feb 2019 he went to Singapore to present a paper on Hijra Autobiographies. He edits an international online journal 'Critical Paradigm' which can be accessed at www.criticalparadigmjournal.com.
He is an acclaimed poet of Hindi as well and has published three poetry collections namely 'Ret ke Sahar Me', 'Phir Khilenge Fool Priytam' and 'Jindagi Jo Shayari Hoti'. Recently his story collection 'Apna Apna Moksh' (2024) has been published worldwide and is available on Amazon and Flipkart.