महर्षि याज्ञवल्क्य के वंश में आज पहली बार एक पुत्री ने जन्म लिया था। सभी ओर प्रसन्नता थी और महर्षि याज्ञवल्क्य के प्रपौत्र अपनी पुत्री को अपनी गोद में लेकर दुलार रहे थे। उनकी पत्नी सुमेधा भी बहुत प्रसन्न थी क्योंकि महर्षि याज्ञवल्क्य के वैकुंठ जाने के बाद अब जाकर तीसरी पीढ़ी में किसी पुत्री ने जन्म लिया था। महर्षि याज्ञवल्क्य ने तो एक चुहिया को ही अपनी पुत्री बनाकर उसका विवाह किया था, आपको याद ही होगा।
नीतिवल्क्य की पुत्री का नाम था यज्ञसेनी, और हो भी क्यों नहीं, आखिर वह इतने पूजा पाठ के बाद सुमेधा की गर्भ में आई थी। धीरे-धीरे समय गुजरता गया और यज्ञसेनी बड़ी हो गई। नीतिवल्क्य और सुमेधा को अब उसे उसके विवाह की चिंता सताने लगी थी। अगर महर्षि याज्ञवल्क्य जीवित होते तब तो उन्हें इसकी चिंता नहीं करनी पड़ती क्योंकि उनकी प्रसिद्धि चारों ओर थी, लोगों उन्हें जानते थे और महर्षि याज्ञवल्क्य के घर में विवाह करने को कोई भी तैयार हो जाता। हालांकि अब उनका आश्रम महर्षि याज्ञवल्क्य के समय से करीब चार गुना बड़ा हो चुका था और उनके अंतर्गत अब कई महाविद्यालय भी ज्ञान और शिक्षा का प्रचार प्रसार कर रहे थे परंतु फिर भी उनकी अपनी प्रसिद्धि महर्षि याज्ञवल्क्य से कम ही थी। अब समय बदल चुका था, लगभग तीन सदियां बीत चुकी थी। देश भी अब आजाद हो चुका था और एक विकासशील देश की भांति अपनी प्रगति के रास्ते पर चल पड़ा था। लोगों ने नए व्यवसाय एवं उपक्रम स्थापित करने शुरू कर दिए थे और इसलिए उनके सामने अपनी पुत्री के लिए वर खोजना एक चुनौती से कम नहीं था। वह एक अच्छे पिता माता की तरह अपनी सुपुत्री को इन नए व्यवसाय वाले वर से विवाह कर देने को उत्सुक थे। वह जब भी लोगों से राय लेते तो सभी अलग-अलग व्यवसाय के वर सुझाते और फिर अपने तर्कों से उन व्यवसायों को दूसरे व्यवसाय से उत्तम बताते। कोई शिक्षकों को ठीक कहता, कोई वैज्ञानिकों को, कोई सैनिकों को, कोई डॉक्टरों को और कोई कवियों को। दोनों पति पत्नी बहुत परेशान रहते। इसलिए उन्होंने बारी-बारी से विभिन्न व्यवसायों के संबंध में अपनी पुत्री की राय पूछनी शुरू कर दी, बात भी सही थी, समय बदल गया था और बिना पुत्री की राय के विवाह करना नियम विरुद्ध भी था क्योंकि सरकार ने अब बड़े कड़े नियम बना दिए थे। तभी उनको किसी ने एक वैज्ञानिक वर की सूचना दी जो भारत सरकार के किसी बड़े अंतरिक्ष प्रक्षेपण मिशन में कार्यरत था और उन्होंने उसकी तस्वीर देख कर उसे पसंद भी कर लिया। जब उन्होंने अपनी सुपुत्री से इसके संबंध में राय लेनी चाही, यज्ञसेनी ने उस तस्वीर को देखा और कुछ देर सोचकर वह बोली, “पिताजी, तस्वीर तो ठीक है परंतु यह एक वैज्ञानिक है और मुझे भय है कि यह दिन रात अन्वेषण और शोध में लगा रहेगा, मेरे लिए तो इसके पास समय ही नहीं होगा। और तब तो यह मेरे साथ पूजा-पाठ भी नहीं कर पाएगा न मंदिर ही जाएगा। तस्वीर से यह मुझे एक नई सोच का भी लगता है और मुझे भय है इसके साथ मुझे उसके दोस्तों और उच्च पदस्थ अधिकारियों से भी मिलना होगा। और इसमें तस्वीर पर अपना नाम अंग्रेजी में लिखा है, तो क्या मुझे अंग्रेजी भी सीखनी पड़ेगी? इसलिए मुझे तो यह ठीक नहीं लग रहा, आप कोई अन्य वर देखें”। यज्ञसेनी के इतना कहते ही दोनों निराश हो गए क्योंकि उन्होंने इस वर के संबंध में बड़ी ही प्रशंसनीय बातें सुन रखी थी। वह एक उच्च कोटि का वैज्ञानिक था और गाहे-बगाहे विदेशों में भी व्याख्यान देने जाया करता था। वह समझ नहीं पा रहे थे कि उनकी पुत्री क्या खोज रही थी?
खैर, ऐसे ही पंद्रह बीस दिन और बीत गए, तभी उनके किसी संबंधी ने एक सेना अधिकारी वर का नाम सुझाया। उसकी कुंडली भी उनकी पुत्री से मिल रही थी। अगले ही दिन वे उनके घर जा पहुंचे। देखने पर उन्हें यह वर बहुत पसंद आया, उसकी वर्दी उसके शरीर पर खूब सज रही थी, लंबा गोरा चिट्टा व्यक्तित्व, अभी नया-नया ही सेना अधिकारी बना था। घर पहुंच कर उन्होंने यज्ञसेनी से उसकी पसंद पूछ लिया, “बिटिया यह देखो, यह तो पसंद आएगा तुम्हें?” यज्ञसेनी उस तस्वीर को निहार रही थी जैसे ही उसे अपने पसंद का वर मिल गया था परंतु थोड़ी देर सोचने के उपरांत उसने कहा, “नहीं पिताजी,यह ठीक नहीं है। इसके साथ मुझे आप लोगों से बहुत दूर जाना पड़ेगा, शायद सीमांत प्रदेशों में भी, और मैंने सुना है, यह लोग मांस मछली भी खाते हैं, पार्टियों में नाचते भी हैं, और इनकी औरतें इनके अधिकारियों के साथ शराब भी पीती है। मुझसे तो यह ना होगा। अगर युद्ध छिड़ गया तो क्या होगा, यह तो मुझे छोड़कर चला जाएगा। और सीमांत प्रदेशों में तो पूजा सामग्री भी नहीं मिलती। नहीं नहीं , कोई और देखिए”। पिता माता को फिर निराशा हाथ लगी क्योंकि इस बार उन्हें पूर्ण विश्वास था कि यह सैन्य अधिकारी मेरी पुत्री को जरूर पसंद आएगा, पर वह कर ही क्या सकते थे, फिर एक नए वर की तलाश शुरू हो गई।
उनका तीसरा चयन एक शिक्षक था जो लिखता भी था, उसकी बहुत सारी कविताएं और लेख छप चुके थे। अक्सर वह सरकार की कमजोरियों पर प्रकाश डालता, लोग उसे पसंद भी करते, एक अच्छे विश्वविद्यालय में पढ़ा भी रहा था। कुल मिलाकर यह अच्छा चयन था जो दोनों को पसंद आ रहा था। पर जाने को उनके मन में मन में डर हो रहा था कि कहीं यह भी बिटिया अस्वीकृत न कर दे। पूछने पर यज्ञसेनी नाराज हो गई, “अब यही बचा है मेरा दूल्हा बनने को, इसकी कमाई भी कुछ खास नहीं, दिन भर तो यह लिखने पढ़ने मे व्यस्त रहेगा, फिर आकर घर में शोध छात्रों के साथ बड़ी-बड़ी आदर्श की बातें करेगा और उन्हें मुझे चाय पिलानी पड़ेगी। इसलिए लेखक या कविता लिखने वाले एकदम नहीं, मैंने तो निराला को देखा है, मुंशी प्रेमचंद को पढा है, उन्होंने अपने परिवार को कुछ नहीं दिया, सिर्फ कविताओं और उपन्यासों के सिवा। रामधारी सिंह दिनकर ने तो देवताओं और मंदिरों के खिलाफ भी कुछ लिख दिया था, यह कौन सी अच्छी बात है, यह तो मुझसे नहीं होगा?”
अंततः उनका अगला प्रयास भी असफल हो चुका था, इसके बाद कुछ डॉक्टरों और इंजीनियरों की भी कुंडली मंगवाई गई और उनको बारी-बारी से यज्ञसेनी के सामने प्रस्तुत किया गया। यज्ञसेनी ने एक-एक करके सबको अस्वीकृत कर दिया। नीतिवल्क्य एवं सुमेधा अंततः निराश हो सके चले थे और किसी भी काम में उनका मन नहीं लग रहा था। एक-दो दिन के पश्चात अचानक उनकी बेटी ने उन्हें एक फेसबुक प्रोफाइल दिखाई जिसमें केसरिया रंग का कुर्ता पहने, तिलक लगाए और हाथ में झंडा लिए एक लड़का था, इत्तेफाक से वह पास का ही रहने वाला था। यह लड़का यज्ञसेनी को बहुत पसंद था और उससे वह कभी-कभी चैट भी किया करती थी। यज्ञसेनी ने इशारों इशारों में उन्हें उसकी शादी की बात इस लड़के से चलाने की इच्छा जताई जो पास के ही एक महंत का लड़का था। वह विभिन्न मंचों पर जोर-जोर से नारे लगाता हुआ यूट्यूब वीडियो जारी करता, उस पर हेट स्पीच के पांच सात मुकदमे दायर हो चुके थे और वह सभी नेताओं के साथ नजर आता जैसे यही उसका काम था। उसका व्यवसाय उसके पिता के मठाधीशी से जुटाए हुए रुपयों से बहुत जोरदार चल रहा था क्योंकि आजकल धर्म का व्यवसाय अपने चरमोत्कर्ष पर था। पिता-माता उसकी तस्वीर को देखकर सोच में पड़ गए थे। जिस भारत की प्रगति को देखकर उन लोगों ने अपनी पुत्री का विवाह इंजीनियर, डॉक्टर, लेखकों, वैज्ञानिकों और सैनिक अधिकारियों से करने के सपने देखे थे वह भारत सोशल मीडिया, यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर लगातार आते हुए पोस्टों के कारण बड़ी तेजी से बदलने लगा था।
नीतिवल्क्य को आज अपने पूर्वज महर्षि याज्ञवल्क्य याद आने लगे थे जिन्होंने अपनी पुत्री के विवाह की समस्या को देखते हुए बाध्य होकर उसे फिर चुहिया बना दिया था। उन्हें लग रहा था कि आज फिर वही कहानी एक बदले रूप में चरितार्थ हो रही है क्योंकि उनकी पुत्री सभी नए प्रगतिशील व्यवसाय वाले दूल्हों को छोड़कर फिर जैसे चुहिया बनने को आतुर थी। उसके द्वारा चयनित वर महर्षि याज्ञवल्क्य की कहानी के चूहे से कम शक्तिशाली नहीं था क्योंकि उसने विरोधी दल के बड़े-बड़े पर्वतों को अपनी सोशल मीडिया पोस्ट से धूल चटा दी थी। अभी हाल में ही उसने भारत का नाम बदलकर ‘कैलाशा’ करने का सुझाव अपने वीडियो में दिया था। चुनाव लड़ने वाले सभी नेता उसे अच्छी तरह जान चुके थे और गाहे-बगाहे उसके साथ बैठकें किया करते ताकि सामाजिक सद्भाव कायम रह सके।