Taghindi

ये बहुत बड़ी बात है

जहां बगीचे थे, वहां रेगिस्तान हो गएघरों के आसपास कूड़ेदान हो गएतलो-तालाब सूखकर अनजान हो गएखेत खलिहान अब दुकान हो गए। घर घर न रहे, ऊंचे मचान हो गएलिहाज और शर्म बदनाम हो गएमंदिर, जो कभी थोड़ा सुकून देते थेसिमटकर अब गुमनाम हो गए। कोई रहे कहां और जाए कहां आजदरो दीवार सारे इश्तिहार हो गएदुनिया इतनी बदली कब, पता नहीं मुझेदिल के शीशे टूट कर गाहे गराज हो गए। खुली हवा का एक झोंका दूभर हुआ जहांअब कैमरे हैं...

रौशनी

जहां तक रौशनी नहीं जातीवहां भी मेरी गजल जाएहौसले मेरे कम नहीं होगेभले ताउम्र यह सफर जाए। रोज ही एक नए फसाने काअजीब शौक है तुझकोलिख दूं मैं तुझ पर शेर कोईतेरा नकाब ही उतर जाए। चलो कुछ आग छुपी रहने दूंइश्क भी, रंज भी अपनाकुछ दिनों बाद देखेंगेकहां क्या-क्या लिखा जाए? मैं बहुत दूर निकल आयाजैसा उसने मुझसे चाहा थाअब तो पिछला मरहला मुझकोज़रा ज़रा सा ही बसर आए। अब कलम है, चंद गजलें हैंमैं ही उस्ताद हूं...

संसार

यह प्यारा मधुमय सा संसारप्रात खोले है मन का द्वारदिवस भर खुशियों का अंबाररात को तारों में घर बार। क्षितिज जब उगता है सोनानींद छोड़े हैं हर कोनाकूकते कलरव करते खगकिरण से जगमग होता जग। फूल खिल उठते हैं सारेअंगड़ाई लेती हैं कलियांखुशबू फैल रही हर ओरजहां मदमस्त हो गए मोर। सुबह की भीगी यह खुशबूबुलाती मुझको अपने पासपुष्प पर भ्रमरो की अनुगूंजलगता है आया ज्यों मधुमास। फैलती महुए की चादरटपा टप पेड़ों के...

मरासिम

जिंदगी सरपट गुजरती जा रही हैजैसे कोई हो रेलगाड़ीआ भी रहे हैं लोगजा भी रहे हैं लोगहर आदमी अपने मरासिम जी रहा है।

सभी जल्दी में कितने आजकल हैं?रिश्ते भी दूरभाषी हो गए हैंइच्छाएं स्वप्न में अब ढल रहीं हैंदूरियां तो मिट गईं भूगोल कीपर उम्मीदें कितनी खाली हो गईं हैं।

सुबह से शाम तक हम राह तकतेकहीं मुस्कान में छल हैकहीं पहचान दुर्बल हैएक दूसरे से अब किनारा हो गया हैआदमी टूट कर कितना बेचारा हो गया है।

शब्द ही मिले नहीं

न जाने कितने भावों कोकभी शब्द ही मिले नहींन जाने कितने गीतों कोकभी राग ही मिले नहीं। उमड़ कर बदलियां कितनीबरसी नहीं मरू में भीन जाने कितने फूलों कोदेखा नहीं किसी ने भी। क्या हिसाब तारों काजो टूट कर बिखर गएक्या हिसाब आहों कामिला कोई भी सिला नहीं। भ्रमर भी घूम कर लौटेकभी रस बिना ही उपवन सेकितने ही मृग दिशा खोकरसमूह से बिछड़ गए। न जाने कितने साधक कोसाध्य ही मिला नहींजो सदा व्याप्त घट घट मेंपास ही...

रिश्ते

अब कोई मेहमान रुक नहीं पाताझट से आता है चला जाता है।

अभी तो पुरसाहाल भी न पूछा मैंनेफिर आऊंगा, नहीं है वक्त सुना जाता है।

समय की भेंट चढ़े सब रिश्ते मेरेजिंदगी रेत के मानिंद फिसल जाती है।

दिल हो गए अब दूर कि तलबगारी मेंउनका आना भी एक जख्म लगा जाता है।

मैं भी हूं, वे भी है, सब कुछ तो है दुनिया मेंमेरा घर खाली है, खाली ही रह जाता है।

सुधर जाइए

अभी भी समय है सुधर जाइएबहुत लंबा सफर है सुधर जाइए।

देख लो लालिमा पूर्व में दिख रहीजल्द होता सहर है सुधर जाइए।

आंधियां कब रही किसी कैद मेंरात अंतिम पहर है सुधर जाइए।

नफरत की खेती बुरी चीज हैबीत जाए न खुद पर सुधर जाइए।

यह माना नशे में है ताकत बहुतपर जल्दी उतरता सुधर जाइए।

जाने कितने घरौंदे यूं ही टूटतेदर्द देता कहर है सुधर जाइए।

तल्ख़ियां कब तलक गूंजती रह गईउसकी सब पर नजर है सुधर जाइए।

सब चले गए

सब चले गएजितने थे…नेह के, स्पर्श केताप के, संघर्ष केप्रतिबिंब चले गए। वो छोटा सा घरौंदाक्षिति परमिट्टी का चूल्हाकुछ सोंधा सोंधा साखदर कर बह गया जोबारिश के थपेडों में कभी का। वो मां की हथेली और आंचलजो हमे था सिक्त करतावो दादी, खुद कहानी बन गईंलोरी सुना करपोते के सिर पर फिर रहे वो हाथबाबा के, कुछ खुरदरे सेउंगलियां जो सिंक गईं होरहा लगातेबाप के कंधे, कराते जो सवारीपीढियों का एक होना परस्परजूझना...

रेत के शहर में

नया सा पुष्प किसी भी डाल परनया पल्लव किसी भी टहन परहरी सी दूब मृदा की छाल परउगेगी क्या रेत के शहर में? प्रेम की किरण मन के क्षितिज परनई मुस्कान किसी के अधर परनया संगीत किसी भी ताल परसजेगा क्या रेत के शहर में? मैं खुद सृष्टा हूं ऐसे तंत्र कामैं खुद दोषी हूं भूले मंत्र कामनुज से मनुज बिल्कुल विलग सा हैफलेगा क्या रेत के शहर में? कैसे परिजन, क्या कुटुंब की कल्पनाबड़ों का संग, धर्म की अल्पनासभी भूले...

महफिल

कहीं सूरज दिखा दिया हमनेकहीं पर शाम कर डालीबस अपने चंद शेरों सेहर महफिल गुलाम कर डाली। हर दिन फूल खिले मिलते हैंहर एक रात रातरानी हैजब से तुम पास मेरे बैठ गएअब तो दुश्मन भी गले मिलते हैं। तेरे ही नाम जिंदगी कर लीतुम्हें ही चारागर सा मान लियाजब अंधेरों से मुलाकात हुईतुझसे ही रोशनी कर ली। प्यार का फलसफा ही ऐसा हैमेरे गीतों में आशनाई हैआधा मिसरा ही कहा है मैंनेउसके होठों पर हंसी आई है। एक दिन गिरा...

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Prof. Vachaspati Dwivedi teaches English in Sant Vinoba P.G. College, Deoria, U.P. India. He is a PhD from India's reknowned University BHU, Varanasi with a first class Post-graduate degree. His foreign tenures took him to teach in Haramaya University, Ethiopia and Al Fateh University Tripoli, Libya. He has 8 books to his credit and more than 30 papers published in different journals, both national and international. In 2012 he presented a paper on Folk Literature in Bangkok International Conference , Thailand and in Feb 2019 he went to Singapore to present a paper on Hijra Autobiographies. He edits an international online journal 'Critical Paradigm' which can be accessed at www.criticalparadigmjournal.com.
He is an acclaimed poet of Hindi as well and has published three poetry collections namely 'Ret ke Sahar Me', 'Phir Khilenge Fool Priytam' and 'Jindagi Jo Shayari Hoti'. Recently his story collection 'Apna Apna Moksh' (2024) has been published worldwide and is available on Amazon and Flipkart.