महर्षि याज्ञवल्क्य के वंश में आज पहली बार एक पुत्री ने जन्म लिया था। सभी ओर प्रसन्नता थी और महर्षि याज्ञवल्क्य के प्रपौत्र अपनी पुत्री को अपनी गोद में लेकर दुलार रहे थे। उनकी पत्नी सुमेधा भी बहुत प्रसन्न थी क्योंकि महर्षि याज्ञवल्क्य के वैकुंठ जाने के बाद अब जाकर तीसरी पीढ़ी में किसी पुत्री ने जन्म लिया था। महर्षि याज्ञवल्क्य ने तो एक चुहिया को ही अपनी पुत्री बनाकर उसका विवाह किया था, आपको याद ही...
आदत
कविता जा रही हैपुस्तकें भी जा रही हैंतुमको हो गई आदतअब मसाले की। संस्कृति भी जा रही हैधर्म भी जा रहे हैंफिक्र किसको हैअब रीति-रिवाजों की? गीत की सांस टूटीकथाकारी तिरस्कृत हैतुमको हो गई है आजचिंता बस निवाले की। लोक भाषाएं हमारीगुड़ की चाशनी सीतुमको हो गई आदतअलग सा गुनगुनाने की। रचना सिमटकर पुस्तकों मेंचंद सांसे गिन रही हैतुमको हो गई आदतनजरें चुराने की। सभ्यताएं मिट गई कितनीइसी तरह, धीरे धीरेतुमको...
ये बहुत बड़ी बात है
जहां बगीचे थे, वहां रेगिस्तान हो गएघरों के आसपास कूड़ेदान हो गएतलो-तालाब सूखकर अनजान हो गएखेत खलिहान अब दुकान हो गए। घर घर न रहे, ऊंचे मचान हो गएलिहाज और शर्म बदनाम हो गएमंदिर, जो कभी थोड़ा सुकून देते थेसिमटकर अब गुमनाम हो गए। कोई रहे कहां और जाए कहां आजदरो दीवार सारे इश्तिहार हो गएदुनिया इतनी बदली कब, पता नहीं मुझेदिल के शीशे टूट कर गाहे गराज हो गए। खुली हवा का एक झोंका दूभर हुआ जहांअब कैमरे हैं...
रौशनी
जहां तक रौशनी नहीं जातीवहां भी मेरी गजल जाएहौसले मेरे कम नहीं होगेभले ताउम्र यह सफर जाए। रोज ही एक नए फसाने काअजीब शौक है तुझकोलिख दूं मैं तुझ पर शेर कोईतेरा नकाब ही उतर जाए। चलो कुछ आग छुपी रहने दूंइश्क भी, रंज भी अपनाकुछ दिनों बाद देखेंगेकहां क्या-क्या लिखा जाए? मैं बहुत दूर निकल आयाजैसा उसने मुझसे चाहा थाअब तो पिछला मरहला मुझकोज़रा ज़रा सा ही बसर आए। अब कलम है, चंद गजलें हैंमैं ही उस्ताद हूं...
संसार
यह प्यारा मधुमय सा संसारप्रात खोले है मन का द्वारदिवस भर खुशियों का अंबाररात को तारों में घर बार। क्षितिज जब उगता है सोनानींद छोड़े हैं हर कोनाकूकते कलरव करते खगकिरण से जगमग होता जग। फूल खिल उठते हैं सारेअंगड़ाई लेती हैं कलियांखुशबू फैल रही हर ओरजहां मदमस्त हो गए मोर। सुबह की भीगी यह खुशबूबुलाती मुझको अपने पासपुष्प पर भ्रमरो की अनुगूंजलगता है आया ज्यों मधुमास। फैलती महुए की चादरटपा टप पेड़ों के...
मरासिम
जिंदगी सरपट गुजरती जा रही हैजैसे कोई हो रेलगाड़ीआ भी रहे हैं लोगजा भी रहे हैं लोगहर आदमी अपने मरासिम जी रहा है।
सभी जल्दी में कितने आजकल हैं?रिश्ते भी दूरभाषी हो गए हैंइच्छाएं स्वप्न में अब ढल रहीं हैंदूरियां तो मिट गईं भूगोल कीपर उम्मीदें कितनी खाली हो गईं हैं।
सुबह से शाम तक हम राह तकतेकहीं मुस्कान में छल हैकहीं पहचान दुर्बल हैएक दूसरे से अब किनारा हो गया हैआदमी टूट कर कितना बेचारा हो गया है।
शब्द ही मिले नहीं
न जाने कितने भावों कोकभी शब्द ही मिले नहींन जाने कितने गीतों कोकभी राग ही मिले नहीं। उमड़ कर बदलियां कितनीबरसी नहीं मरू में भीन जाने कितने फूलों कोदेखा नहीं किसी ने भी। क्या हिसाब तारों काजो टूट कर बिखर गएक्या हिसाब आहों कामिला कोई भी सिला नहीं। भ्रमर भी घूम कर लौटेकभी रस बिना ही उपवन सेकितने ही मृग दिशा खोकरसमूह से बिछड़ गए। न जाने कितने साधक कोसाध्य ही मिला नहींजो सदा व्याप्त घट घट मेंपास ही...
रिश्ते
अब कोई मेहमान रुक नहीं पाताझट से आता है चला जाता है।
अभी तो पुरसाहाल भी न पूछा मैंनेफिर आऊंगा, नहीं है वक्त सुना जाता है।
समय की भेंट चढ़े सब रिश्ते मेरेजिंदगी रेत के मानिंद फिसल जाती है।
दिल हो गए अब दूर कि तलबगारी मेंउनका आना भी एक जख्म लगा जाता है।
मैं भी हूं, वे भी है, सब कुछ तो है दुनिया मेंमेरा घर खाली है, खाली ही रह जाता है।
सुधर जाइए
अभी भी समय है सुधर जाइएबहुत लंबा सफर है सुधर जाइए।
देख लो लालिमा पूर्व में दिख रहीजल्द होता सहर है सुधर जाइए।
आंधियां कब रही किसी कैद मेंरात अंतिम पहर है सुधर जाइए।
नफरत की खेती बुरी चीज हैबीत जाए न खुद पर सुधर जाइए।
यह माना नशे में है ताकत बहुतपर जल्दी उतरता सुधर जाइए।
जाने कितने घरौंदे यूं ही टूटतेदर्द देता कहर है सुधर जाइए।
तल्ख़ियां कब तलक गूंजती रह गईउसकी सब पर नजर है सुधर जाइए।
सब चले गए
सब चले गएजितने थे…नेह के, स्पर्श केताप के, संघर्ष केप्रतिबिंब चले गए। वो छोटा सा घरौंदाक्षिति परमिट्टी का चूल्हाकुछ सोंधा सोंधा साखदर कर बह गया जोबारिश के थपेडों में कभी का। वो मां की हथेली और आंचलजो हमे था सिक्त करतावो दादी, खुद कहानी बन गईंलोरी सुना करपोते के सिर पर फिर रहे वो हाथबाबा के, कुछ खुरदरे सेउंगलियां जो सिंक गईं होरहा लगातेबाप के कंधे, कराते जो सवारीपीढियों का एक होना परस्परजूझना...