जिंदगी के इतने वसंत देखने के बाद यह सूक्ति अच्छे से समझ में आई! इसके पूर्व में तो न समय था न विवेक! हमारा अनुभव ही तो आदमी बनाता है, और जब यह बात समझ में आती है तो लगता है कि बहुत कुछ हमारे हाथ से निकल गया जो फिर वापस नहीं आ सकता! जीवन के रास्ते पर हम सभी इतने आगे निकल चुके होते हैं कि अब जो निकल चुका उसे आप फिर जी नहीं सकते, हां आगे का प्रारब्ध अवश्य सुधार सकते हैं जो इस सूक्ति का मंतव्य है! अब सवाल यह उठता है कि पीछे का सोचा जाए कि आगे की सुध ली जाए! आगे की सुध लेने से हमारा भविष्य सुधरेगा और पीछे देखने से पछतावे के अलावा कुछ भी हाथ में नहीं आएगा! हर आदमी का जीवन अलग है और अपने आप में विशिष्ट अतः कोई सरलीकरण नहीं किया जा सकता! कोई महलों में पला बढ़ा है और कोई झोपड़ी में, किसी की शुरुआत शहर से हुई है और किसी की गांव से, कोई ऊंचे वर्ग का है और कोई समाज के निचले पायदान पर खड़ा है! जैसी जिंदगी जिस किसी को मिली है वैसा ही उसका जिंदगी के प्रति व्यवहार और आचरण भी! जिंदगी की कोई परिभाषा उसे ठीक से परिभाषित नहीं कर सकती! इसी कारण भांति भांति की कहानियां और साहित्य लेखन हमें मिलता है!
कोरोना काल में कितने लोग, चाहे अमीर हो या गरीब, दुनिया छोड़कर चले गए और उनके सगे संबंधी कुछ नहीं कर सके! ऐसा ही बहुत सारी विभीषिकाओं, महामारिओं और दुर्घटनाओं में हुआ, परंतु जीवन की गाड़ी तो चलनी है, कोई कितना भी रो गा ले वह रुक नहीं सकती! अतः आदमी को इस सत्य को स्वीकार कर लेना चाहिए जो भी घट रहा है या जो घट चुका है उसमें आपका कोई दोष नहीं! यही जीवन की सच्चाई है! ऐसे में यह सोचना कि अगर ऐसा होता तो ऐसा न हुआ होता, अगर ऐसा नहीं होता तो कैसा हुआ होता, यह मिल जाता तो यह होता या यह न मिले तो क्या होगा, यह एक बचकानी सोच है! चलती का नाम गाड़ी है मित्रों, रुकती का नहीं! इसलिए अपना मन हल्का करके ‘बीती ताहि बिसार दे आगे की सुध ले’ में विश्वास कर चलते जाइए! इसी में जीवन का आनंद है और इसी में जीवन की सार्थकता भी!
बहुत सारे नाटककारों और कवियों ने जीवन पर क्या-क्या लिख डाला है! अगर उन पंक्तियों को भी याद रखा जाए तो कहीं इधर-उधर देखने की आवश्यकता नहीं! पर उनमें एक शर्त है, सर्वप्रथम आप अपने आप को जीवन के इस नाटक का पात्र तो माने! और यहीं पर हम चूक जाते हैं, पात्र मानने के बदले हम अपने आप को जीवन का नियामक मानना शुरू कर देते है ! यही बात बात हमारे धर्म ग्रंथों में भी है! श्रीमद्भागवतगीता को कौन भूल सकता है जिसमें श्री कृष्ण ने अर्जुन को रणभूमि में जीवन के संबंध में इतना बड़ा ज्ञान दिया था! मुझे नहीं लगता मनुष्य के जीवन पर इतना बड़ा व्याख्यान कहीं और उपलब्ध है पर हम सभी बार-बार भ्रमित होते हैं, आशा निराशा के भ्रम जाल में फंसते रहते हैं और अपने को दुख देते रहते हैं! वीर धनुर्धर अर्जुन एक पात्र के अलावा कुछ नहीं थे, भगवान श्री कृष्ण ने यही तो कहा था कि तुम बस एक निमित्त मात्र हो, करने वाला तो मैं हूं और मैं ही हूं, इसके अलावा शेष कुछ भी नहीं! इसलिए जीवन एक यात्रा के अलावा कुछ भी नहीं और हम सब इस राह पर चलते हुए पथिक हैं! नियामक कोई और है! जिस दिन यह यात्रा खत्म हो जाएगी उस दिन सारा संशय मिट जाएगा पर साथ ही मिट जाएगा जीवन का आनंद भी, क्योंकि मृत्यु के बाद तो कुछ हो ही नहीं सकता! जीवन का आनंद बेतकल्लुफ लेने की आवश्यकता है, मुस्कुराने की आवश्यकता है और ठहाके लगाकर हंसने की आवश्यकता है क्योंकि इसके अलावा हम आप कुछ कर नहीं सकते! लोकप्रिय कवि हरिवंश राय बच्चन की पंक्तियां याद कर लें जिन्होंने जीवन को मधुशाला मान कर एक काव्य ग्रंथ लिख डाला और अंग्रेजी के सुप्रसिद्ध नाटककार शेक्सपियर ने नाटक ‘एज यू लाइक इट’ में जीवन को एक रंगमंच मान लिया और उसके पात्रों को निश्चित समयानुसार आगमन और प्रस्थान द्वार दे डाला! उनकी प्रसिद्ध पंक्तियां ‘ऑल द वर्ल्ड इज अ स्टेज, एंड मेन एंड विमेन मैरली प्लेयर्स’ इतनी प्रसिद्ध हो चुकी हैं कि दूसरा उदाहरण देने की आवश्यकता नहीं! इतना कुछ हमारे साहित्य ग्रंथों में मौजूद है फिर भी एक संयम भरा, क्रोध या भेदभाव के अतिरेक से मुक्त व्यवहार हमें बहुत कम देखने को मिलता है! इसलिए सब कुछ भूल कर चलते रहने में ही भलाई है! मुझे आज महाकवि हरिवंश राय बच्चन की कुछ कम चर्चित पंक्तियां याद आ रही हैं जो कुछ इस प्रकार हैं:
जो बीत गई सो बात गई!
मृदु मिट्टी के हैं बने हुए
मधु घट फूटा ही करते हैं
लघु जीवन ले कर आए हैं
प्याले टूटा ही करते हैं
फ़िर भी मदिरालय के अन्दर
मधु के घट हैं,मधु प्याले हैं
जो मादकता के मारे हैं
वे मधु लूटा ही करते हैं
वह कच्चा पीने वाला है
जिसकी ममता घट प्यालों पर
जो सच्चे मधु से जला हुआ
कब रोता है चिल्लाता है?
अतः यात्रा का आनंद लीजिए और चलते रहिए उस नीले क्षितिज की ओर जो हमेशा आगे बढ़ता जा रहा है!