ट्रिन! ट्रिन! ट्रिन! ट्रिन,! ट्रिन! ट्रिन!
अचानक फोन की घंटी बज उठी। प्रो मकरंद त्रिपाठी चौंक कर उठे। रात के तीन बज रहे थे। इस समय कौन हो सकता है, सोचकर उनका मन चिंतित हो उठा, फोन उठाया तो जगेसर के बेटे चंदू का फोन था। चंदू लगातार रोए जा रहा था। उन्हें लगा जरूर कुछ अशुभ हुआ है। पूछा, “अरे चंदू, बता क्या हुआ?” उसने उन्हें जगेसर के देहांत की सूचना दी। उन्हें सुनकर बड़ा कष्ट हुआ, सहसा एक स्तब्धता उनके मन में छा गई। जैसे तैसे उन्होंने उसे ढाढ़स बंधाया और यह बताया कि वह आ रहे हैं, वह कोई चिंता न करे। तब तक उनकी पत्नी भी जाग चुकी थीं और वह गांव जाने के लिए तैयार होने लगे।
जगेसर यानी उनका हलवाहा । जाति से हरिजन। उनके परिवार का सेवक जिसने अपने पिता के मरने के बाद उनके घर की खेती बाड़ी अपने कंधे पर ले ली थी। वह उनके दादी के निर्देशन में हर जगह मौजूद रहता, दरवाजे पर साफ सफाई में, खेतों की जुताई, सिंचाई या निगरानी, जिस भी कार्य आप उसे उपयुक्त समझें। वह उनकी सारी रिश्तेदारियों से परिचित था और अक्सर कोई सामान या संदेशा लेकर वहां जाता रहता। जगेसर के साथ गुजरा समय एवं स्मृतियां अचानक ताजी होने लगीं। जगेसर कुछ दिनों से बीमार चल रहा था। उससे उनकी मुलाकात इधर दो महीने पहले उनके बेटे की शादी में हुई थी जब प्रो मकरंद न्योता करने गांव गए थे। वह ठीक लग रहा था, पर बुढ़ापा तो था ही। और आज उसके देहांत की सूचना आई। उन्होंने कुछ रुपए साथ ले लिए कि कहीं कोई आवश्यकता पड़ जाए, क्योंकि जगेसर के अन्य बेटे दिल्ली या सूरत रहते थे, पता नहीं चंदू के पास पैसे हों या नहीं।
जगेसर का परिवार उनके गांव का रहने वाला नहीं था। उसके बाबा सुन्नर महरा महाराजगंज के किसी गांव के थे, शायद किसी पारिवारिक अनबन के कारण वे सपरिवार उस गांव में सदा के लिए बस गए थे। मकरंद त्रिपाठी के बाबा ने जगेसर के परिवार को थोड़ी जमीन घर बनाने के लिए दे दी थी और अलग से बारह चौदह कट्ठे जमीन जिसपर वह खेती करने लगे थे। सुन्नर के मरने के बाद सेवक और सेवक के मरने के बाद जगेसर, यही क्रम उनके परिवार से संबद्ध। समय बीतने और सामाजिक परिवर्तन के साथ बदलाव भी हो रहे थे, और गांव के मजदूरों का शहर पलायन भी। उसी क्रम में जगेसर के तीन पुत्र विभिन्न शहरों में अपनी आजीविका चलाने हेतु बस गए थे। केवल चंदू ही गांव रहता था।
प्रो मकरंद के पिता सेवानिवृति के बाद गांव ही रहने लगे थे। खेती बारी फिर ठीक से होने लगी थी और जगेसर का ज्यादातर समय उनके दरवाजे पर बीतता, दरवाजे की साफ सफाई या गाय बैलों को सानी देने में, और जब भी उनके पिता खेतों की ओर निकलते तो जगेसर एक परछाई की तरह उनके साथ रहता। कभी कभी डांट भी खाता, नाराज भी होता, पर संबंध नहीं टूटता। कभी कभी डांटे जाने पर उसपर अचानक कोई भवानी सवार हो जाती, वह जोर जोर से अपना सिर हिलाकर कुछ अंट शंट बड़बड़ाने लगता जबकि आस पास के लोग हंसते रहते, पर जगेसर थोड़ी देर बाद शांत हो जाता जब उसके अनुसार भवानी श्राप देकर जा चुकी होतीं। यह सब बचपन में उन्होंने खुद होते हुए देखा था। जगेसर उनसे उम्र में करीब बीस साल बड़े होने के बाद भी कभी कुर्सी पर उनके सामने नहीं बैठता, उसके लिए एक पीढा बरामदे में पड़ा होता जो खुद सरका लेता और बैठ जाता। हां, उसके बेटे जरूर कुर्सी पर बैठ जाते, पर वह कभी नहीं। गाड़ी ड्राइव करते समय उन्हें यह सब अपनी आंखों के सामने दिखाई दे रहा था। वह सोचने लगे कि इतना समर्पित तो कोई सगा भी उनके आस पास नहीं था और इसी भावुकता में उनकी आंखें बार बार नम हो जा रही थीं। घर से निकलते समय पत्नी ने उनके मनोदशा को जानकर ही ठीक से गाड़ी चलाने की हिदायत दी थी पर भावनाओं के वेग के आगे हिदायत का वश कहां चलता है।
उनकी विश्वविद्यालय में नियुक्ति के बाद शहर आ कर बस जाने के बाद गांव के घर में ताला बंद रहने लगा था। पिता माता के देहावसान के बाद कोई गांव नहीं रहता था। कुछ महीनों के अंतराल पर वह गांव जाते और घर की साफ सफाई जगेसर के जिम्मे रहती, नहीं जाने पर कभी कभी फोन भी करता, ठीक वैसे ही जैसे कोई सगा भाई बंधु हो। जगेसर कभी उनके गांव जाने पर प्याज, लहसुन या कोई सब्जी ले जाने का आग्रह करता और गाड़ी में रख जाता। कभी कभी ड्राइवर से पानी की बोतलों मांगकर भैंस का दूध भर लाता, पर सब कुछ गांव वालों की नजरों से छुपा कर कि कहीं गांव वाले उनके बारे में कुछ गलत न सोचने लगें और उनके ब्राह्मण वाली छवि पर कोई आंच न आए। उनकी पत्नी उन्हें घूरने लगतीं पर प्रो मकरंद जगेसर के आग्रह के सामने हार जाते, कुछ कुछ प्रभु राम की कथा में शबरी का स्मरण कर। उनका सब कुछ तो प्रभु राम का ही दिया हुआ था, बुद्धि, विवेक, और उनकी जाति भी, अतः किस बात का डर जब स्वयं राम ने ही जाति की वर्जनाओं से मुक्त होने का पाठ अपने जीवन से पढ़ा दिया था। अतः उनकी जाति भ्रष्ट नहीं होने वाली थी, इतना तो तय था और वे अपनी पत्नी की भाव भंगिमा देखकर मुस्कुराने लगते।
उन्हें याद आने लगा कि कैसे उनके पिता की मृत्यु के समय जगेसर फूट फूट कर रोने लगा था जैसे उसके ही पिता की मृत्यु हुई हो। घाट पर शवदाह की प्रक्रिया के दौरान उनके पट्टीदारों और प्रो मकरंद को पचलकड़िया (चिता पर सगे भाइयों एवं पट्टीदारों द्वारा पांच लकड़ियां अर्पित करने का लोकाचार) देते हुए देखकर उसमें भी पचलकड़िया देने के बारे में इच्छा जगी। उसने उनके चचेरे भाई से पूछा, “का कहतानी, हमहुं दे दीं लकड़ी?”
उनके भाई ने उसे डांट कर चुप करा दिया।
“ना, ना, तु लोग बाम्हन के कैसे देबऽ, तू पट्टीदार ना न हवऽ?”
डांट खा कर वह चुप हो गया, और प्रो मकरंद चाह कर भी उसे यह अधिकार न दिला सके। इस बात का पछतावा उन्हें आज भी था। वह सोचते थे कि जिसने अपना जीवन ही उनके पिता की सेवा मे अर्पित कर दिया वह पट्टीदार से बढ़कर है, पर जाति की बेड़ियां तो हैं ही। हम आप अगर कभी उस परंपरा और सामाजिक मान्यताओं से अलग भी करना चाहें तो भी हमें विवश होकर वही करना पढ़ता है जो समाज हमसे चाहता है, और यही उस दिन भी हुआ। बड़े भाई की अवहेलना करने का साहस जब उनमें ही नहीं था तो जगेसर में कहां से होता।
जगेसर का उनके शहर वाले घर भी दो बार आगमन हुआ था, पहली बार तो तब जब वह अपनी पत्नी का इलाज कराने आया। डाक्टर को दिखा देने के पश्चात प्रो मकरंद उन दोनों को घर ले आए। जगेसर उनके घर की दीवारों और रंगो रोगन को देख आश्चर्यचकित था और वह पूरे शहर के बारे में उनसे लगातार पूछे जा रहा था। उन्होंने उन दोनों को सोफे पर बैठने को कहा, पर दोनों बैठते कैसे? दोनों आस पास कोई पीढ़ा ढूंढ रहे थे पर यहां कोई पीढ़ा तो था नहीं, अतः पति पत्नी कुर्सी पर बैठने में सकुचा रहे थे।
उन्होंने कहा, “अरे बइठऽ जगेसर, ई गांव ना ह, ईंहा पीढ़ा ना मिली, कुर्सी बा, बैइठऽ ।” जैसे तैसे दोनों बैठे और गांव गिराव की बातें होने लगीं, फिर उनके पुत्र, पुत्री एवं नौकरी के बारे में पूछने लगा।
रात को भोजन के पश्चात ऊपर वाले खाली फ्लैट में सोने की व्यवस्था थी पर जगेसर पलंग या चौकी पर उनके घर में सोए, यह नहीं हो सकता था। अंततः चटाई के ऊपर चादर ही उसे स्वीकार थी। सुबह, चाय के बाद बस से पति पत्नी दोनों गांव चले आए, अपने चेहरे पर एक संतुष्टि का भाव लेकर।
उसकी मृत्यु के समाचार ने आज उन्हें हिला दिया था। दो महीने पहले ही तो उनसे मुलाकात हुई थी उससे। न्योता स्वरूप लिफाफा देने के उपरांत जगेसर स्वयं ही कुछ फल और एक बिसलेरी की बोतल उनके लिए ले आया क्योंकि दरवाजे पर भीड़ थी, वह सबके सामने प्रो मकरंद से मिठाई खाने का आग्रह कर गांव में उनकी प्रतिष्ठा को धूमिल नहीं करना चाहता था, हालांकि प्रो मकरंद वहां जलपान करने हेतु पूरी तरह मन बना कर आए थे। उनके और जगेसर की आंखों के बीच संवाद हो चुका था और वे दोनों एक दूसरे के मन में उमड़ते हुए भाव पढ़ रहे थे। यह सारा कुछ आज उनकी आंखों के सामने एक-एक कर दृश्यों में गुजर रहा था और प्रोफेसर मकरंद अपनी भावुकता पर नियंत्रण कर नहीं पा रहे थे।
गांव पहुंचने पर उन्होंने चंदू को ढांढस बंधाया और उसके परिजनों से जगेसर का अंतिम संस्कार ठीक से करने को कहा। उनके वहां आते ही जैसे उसके परिवार को कोई संबल मिल गया था। पास की ही एक छोटी जल धारा के किनारे अंतिम संस्कार होना था। उसके परिजन अंतिम संस्कार में लगे थे और वे सिर्फ निर्देशन कर रहे थे। जब मुखाग्नि दी जाने लगी और पचलकड़िया देने का समय आया तो जगेसर के परिजन बारी बारी से पीछे की ओर लकड़ियां चिता की ओर डाल रहे थे। तभी अचानक प्रो मकरंद नीचे झुके और गिनकर पांच लकड़ियां उठाई और चिता की तरफ पीठ कर डालने करने लगे। चंदू एवं उसके परिजन अचंभित हो कर उन्हें देख रहे थे। यहां कोई उन्हें रोकने को आगे नहीं आ रहा था क्योंकि वे तो निश्चित ही जगेसर के पट्टीदारों से बढ़कर थे। उनकी आंखें नम हो गई थीं। यह जगेसर के सांसारिक बंधनों से मुक्ति का अवसर होने के साथ साथ प्रो मकरंद की भी मुक्ति का अवसर था, उन सारी वर्जनाओं एवं सामाजिक बंधनों से जो उन्हें जकड़े हुई थीं। “सा विद्या या विमुक्तये” का अर्थ यही तो था जिसे अध्यापन करते समय उन्होंने छात्रों के सामने कितनी बार बताया था, पर वह स्वयं कहां मुक्त हो पाए थे? पर आज वह चूकने वाले नहीं थे। उन्हें लगा कि वह मर्यादा पुरुषोत्तम राम के बताए हुए रास्ते पर चलकर राममय होने लगे हैं क्योंकि आज उन्हें अपने पट्टीदारों, समाज और अपने बड़े भाइयों का जरा भी भय नहीं था। शायद यही जगेसर की स्मृति में एक सच्ची श्रद्धांजलि थी।