देश पर दिल-ओ-जान लुटाएंगे
सारे गम भी भुलाते जाएंगे
गिले शिकवे बहुत हैं कहने को
फिर भी वादे सभी निभाएंगे।
किसने देखा है कल को क्या होगा
यही होगा कि कुछ अलग होगा?
फ़िक्र तो हर सुबह यही होगी
ऐ वतन कल को तेरा क्या होगा?
बनते बनते ही स्वप्न रह जाता
सोनचिरइया तुझे ही कहते थे
कौन मानेगा आज देखें तो
राम भी यहीं पर तो रहते थे?
हमने तो देश बनते ना देखा
हमने गांधी को भी है ना देखा
देश पर जान देने वाले भी
भगत या बिस्मिलों को भी ना देखा।
देखते भी तो हम यही कहते
जान ले ले मेरी वतन खातिर
क्यों बचाऊँ में खुद को मरने से
सामने हो मेरे कोई कातिल।
मिल के माटी में ये लहू मेरा
चंद फूलों का गुलकदा होगा
नाम मेरा लिखेगा उनमें भी
जिनका कोई भी फलसफा होगा।
उम्मीदें आज भी ये जिंदा हैं
तू ही तारों का कहकशां होगा
सूर्य सा खिल उठेगा दुनियां में
तेरा ही जिक्र हर जुबां होगा।
देश पर दिल-ओ-जान लुटाएंगे
सारे गम भी भुलाते जाएंगे
गिले शिकवे बहुत हैं कहने को
फिर भी वादे सभी निभाएंगे।