भूले सजन लौटि आवs अब गऊंआलौटि आवs गऊंआ हो आवs हमरे गऊंआंहोए फेर तोहरो दर्शनवां हो रामालौटि आवs गऊंआं। गऊंआ के सोना माटी सरसो फूलाइलमहुआ भी चदरा अस भुईंयां बिछाइलफागुन के आवेला सपनवां हो रामालौटि आवs गऊंआं। जबसे तू गईल पतियो न भेजलअबला बियाहल के सुध बिसरवलकइसन बा तोहरो करेजवा हो रामा?लौटि आवs गऊंआं। अबकि जे अईबो त लौटि न पईबोनेहवा के डोर तोसे अईसन लगईबोगऊंएं में बसिहें परनवां हो रामालौटि आवs...
बदरी
तनी बरसs न हो…तनी बरसs न गऊंआं दलान बदरीरोज रोवेलें बैठलs किसान बदरीताप लीलत बाs लोगन के जान बदरीआजु फंसल बा चिरई के जान बदरीकईलू काहे तू हमके हैरान बदरी?तनी बरसs न गंऊआं दलान बदरी। तनी बरसs न हो…तनी बरसs न गऊंआं दलान बदरीलागी चिरई के कैसे ठेकान बदरी?जबसे कट गईलें सगरो बगान बदरीकहिया अइबू तू ले के फुहार बदरीईहां तरसत बाs दुनिया जहान सगरीतनी बरसs न गऊंआं दलान बदरी। तनी बरसs न हो…तनी बरसs न दुनिया...
जहाजिन
कहियो आवs न हो..कहियो आवs न हमरो दलान चिरईकि सुनाईं हम आपन बयान चिरईबहुते उजड़ल बा मनवां के छान चिरईजबसे छूटल ऊ पुरखन के गांव सगरीहिया अइंठे हो जैसे गतान चिरईकहियो बिसरल न दिनवा पुरान चिरईकहियो आवs न हमरो दलान चिरई। कहियो आवs न हो…कहियो आवs न हमरो दलान चिरईकि सुनाईं हम आपन बयान चिरईदूर भईलें हो रिश्ता नातान सगरीहम ना जनलीं फिरंगी के चाल चिरईबहुते जालिम बा गिरमिट के जाल चिरईहमसे बिछुड़ल हो गंऊआं...
जीये भोजपुरिया हो
जीयेs भोजपुरिया हो, जीयेs हो पुरबियाबसs चाहे जाई कौनो देशsआपन ई बोलीया भुलईहs न कबो रामाकेतनो अलग परिवेश। माटी के रंगवा रंगाइल ई बोलिया होमहके जा के हर देसडांटि के जो बोले केहू तबो लागे मीठे मीठतनिको लागे नाहिं ठेस। होलिया दिवलिया में गाईं भोजपुरियालागेला पुरबिये के तानमनवां में लागे जैईसे एही में जीनगीएही में सांझि आ बिहान। हमके त लागे जईसे एही में पीपरएही में कोईलिया के बानएही में ऊ सरसो पियर...
बुडुआ
‘बुडुआ’ भोजपुरी भाषा का शब्द है जो बच्चों को डराने हेतु पूर्वांचल के गांवों में खूब प्रयोग किया जाता है। यह न भूत है न प्रेत है और न जिन्न ही है। यह तालाब के पानी में रहता है और रात को राह चलते राहगीरों को तालाब में डूबा कर मार डालता है। बुडुआ के डुबाए हुए लोग बुडुआ ही बनते हैं और इस तरह उनका समूह बढ़ता रहता है क्योंकि कोई और ऑप्शन है ही नहीं। सहोदर चाचा के अनुसार इनका रंग सफेद होता...
ये और बात है
ये और बात है कि मैं कुछ नहीं कहता तुमकोइस नए शौक के कुछ तो मायने होंगे।
लोग मजमून जान लेते थे कभी लिफाफे सेतुम कौन सुखनवर हो की अंजान बने रहते हो?
वह भी एक दौर था जब दिलों पर ताले कम थेअब गुजारिश है कि हवा को तो हवा रहने दो।
नशे का वक्त है शायद होश कहां अब मुमकिनयह मेरी जिद है कि पहचान बनी रहती है।
मेरी जुबान तू सच कहने में डरती क्यों हैतोहमत ए दाग से तो चांद भी न बच पाया है।
जब चलते चलते रात हुई
जब चलते-चलते रात हुईइन छालों से कुछ बात हुईमंजिल का था पता नहींकुछ आंखों से बरसात हुईथक कर बैठा था मनुज मौनजुगनू बोला रोता है कौन?छोड़ो तुम सारी चिंताएंबीता जो कल की बात हुईआंसू क्यों व्यर्थ बहाते होबाधाओं से घबराते हो? आओ मैं तेरी थकन हरूंअपने मन कि बात कहूंरातों के घने अंधेरे मेंजब जलता कोई दीप नहींपदचिन्हों की हर रेख मौनकिससे पूछेगा राह कौन?जब तारों पर छाते बादलतूफान हो गया हो पागलतब भी आशाएं...
चल चलीं गांव की ओरिया
चल चलीं गांव की ओरिया…कि मन भरल रहत शहरियारहत शहरिया हो, करत नोकरियाकि मन भरल रहत शहरिया…कि चल चलीं गांव की ओरिया। जहवां पर बीतल हो बचपन के दिनवांजहवां पर लागेला सावन में झुलनवांजहवां पर तोहर घर दुआर हो…कि चल चलीं गांव की ओरिया। नौकरी पर मेठ लोग रोज धमकावेपाई पाई जोरि सब चऊका चलावेमहंग भईल दुई जून रोटिया…कि चल चलीं गांव की ओरिया। राहि देखत सूखि गइलें अखियां के पनियांमाई बाप याद करें तोहर...
फिर खिलेंगे फूल प्रियतम
फिर खिलेंगे फूल प्रियतमफिर से होगी भोरआस की किरण जगेंगीमधुमास में चहूं ओर। रातरानी फिर करेगीनींद से मुंहजोरमोगरे पर फिर से होंगेभ्रमर, रस के चोर। सुख-दुख लिखे हैं नियति मेंज्यों दिवस में अवसानरात का होना निरंतरहै सुबह का सम्मान। सुख परखता आदमी केकर्म को, संज्ञान कोदुख परखता आत्मबल कोतेज को, अभिमान को। क्या मनुज जो रो रहा हैअल्प से ठहराव मेंक्या मनुज जो दुखी होकरडूबता अवसाद में। क्या हुआ जो आज...
सुप्रीम कोर्ट ऑफ देवरिया
ट्रिन,ट्रिन,ट्रिन…ट्रिन,ट्रिन,ट्रिन…ट्रिन,ट्रिन! अचानक फोन की घंटी बजी। मैं सो रहा था । घड़ी देखा तो रात के तीन बज रहे थे, मैं सोचने लगा, इस समय कौन हो सकता है? चिंता हो गई, कहीं कोई अशुभ समाचार तो नहीं, या कोई मदद के लिए बुला तो नहीं रहा? हड़बड़ा कर उठा, मोबाइल की घंटी अभी भी बज रही थी, उठाकर देखा तो डॉ भूप की कॉल थी। घबरा कर फोन उठाया, पूछा “अरे भाई क्या हुआ?” “उठिए भैया, आपको पता...