ट्रिन,ट्रिन,ट्रिन…ट्रिन,ट्रिन,ट्रिन…ट्रिन,ट्रिन!
अचानक फोन की घंटी बजी। मैं सो रहा था । घड़ी देखा तो रात के तीन बज रहे थे, मैं सोचने लगा, इस समय कौन हो सकता है? चिंता हो गई, कहीं कोई अशुभ समाचार तो नहीं, या कोई मदद के लिए बुला तो नहीं रहा? हड़बड़ा कर उठा, मोबाइल की घंटी अभी भी बज रही थी, उठाकर देखा तो डॉ भूप की कॉल थी। घबरा कर फोन उठाया, पूछा “अरे भाई क्या हुआ?”
“उठिए भैया, आपको पता नहीं है क्या?”
“क्या हुआ भाई?”
“लेखक ही बने रहेंगे आप, आपको मालूम नहीं, अमृत काल की घोषणा हुई है?”
“आंय। कैसा अमृत काल भाई?”
“अरे वही जो वित्त मंत्री जी ने बजट में कहा था। अब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में भी अमृत काल आज रात ही घोषित कर दिया।”
“आंय।”
“हां, उठकर टीवी खोलिए और इस बार खासकर देवरिया पर विशेष ध्यान है उनका।”
मैं और भी चकित हो गया, “देवरिया पर विशेष ध्यान?”
डॉ भूप का आशय कुछ समझ में नहीं आ रहा था।
“मैंने कहा, अरे भाई स्पष्ट बोलिए, पहेलियां क्यों बुझा रहे हैं?”
डॉ भूप ने तंज कसते हुए कहा, “कॉलेजियम व्यवस्था को हटाकर तीन जज नियुक्त हुए सुप्रीम कोर्ट ऑफ देवरिया में।”
मैं चकित हो गया, “सुप्रीम कोर्ट ऑफ देवरिया में? यह कैसे हुआ? कौन नियुक्त हुए हैं?”
“पूरी एक बेंच बना दिया है उन्होंने, और आपके प्रो मकरंद मिश्र चीफ जस्टिस ऑफ देवरिया, डॉ विश्वगुरु सेकंड जस्टिस, प्रो अजायब सिंह थर्ड जस्टिस और डॉ चंद्रिका रजिस्ट्रार ऑफ द सुप्रीम कोर्ट, देवरिया।”
मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं था, कुछ समझ में नहीं आया, यह क्या हो रहा था, कैसे हो रहा था, बस मैं उनकी बात सुनता जा रहा था।
“मैंने पूछा, क्या यह घोषणा रात को हुई?”
“अरे। आपको कुछ पता नहीं, कविता की दुनिया से बाहर निकलिए।”
“आपको नोटबंदी याद है, वह रात को हुई थी, यह सरकार हर महत्वपूर्ण काम रात को ही करती है।”
डॉ भूप ने फिर मुझे लपेटे में लिया।
मैं आश्चर्यचकित, भ्रमित होकर बस उनकी बातें सुनता जा रहा था। बात तो सही थी, नोटबंदी रात को ही हुई थी।
“अरे, बधाई देने चलेंगे”, उन्होंने पूछा?
मुझे कुछ भी सूझ नहीं रहा था, घबराकर पूछा, “अरे विधि विभाग से किसी का हुआ कि नहीं?”
“नहीं, विधि विभाग से किसी का क्यों होगा?”
“अरे भाई, पूरे देवरिया में अकेला विधि विभाग है, अपने प्रोफेसर शाह, उनको तो लेना चाहिए था।” मैंने कहा।
“उनका कैसे होगा? भूल गए आप की वह जे एन यू से पढ़े हुए हैं।
“हां, हां। बात तो आपकी सही है”, मैंने सहमति देते हुए कहा।
“कुछ नहीं छोड़िए, बस तैयार होईये, हम देवरिया चलेंगे।”
“अरे, रात के तीन बजे? सुबह तो होने दीजिए, चलेंगे।” मैंने कहा।
“फिर आप नहीं समझ रहे। अमृत काल का अर्थ होता है कि दिव्य मुहूर्त में बधाई दी जाए, भूल गए, शरद पूर्णिमा में अमृत रात को ही बरसता है। बस आप तैयार हो जाइए, मैं निकल रहा हूं, पार्क के पास आइए।”
मैं किंकर्तव्यविमूढ़ सा खड़ा उनकी बातें सुन रहा था।
“ओके ओके, ठीक है।”
जैसे तैसे फोन रखा और सोचने लगा। यह नई व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट में कैसी रहेगी? विश्वास तो अभी भी नहीं हो रहा था, पर हमारे प्रधानमंत्री जी क्या नहीं कर सकते? वह जनता को चौंकाने का माद्दा रखते हैं, इसमें मुझे कोई संदेह नहीं था।
धीरे-धीरे मेरे सामने देवरिया का सारा पिछला समय याद आने लगा। मैं सोचने लगा कि कैसे आज तक प्रो मकरंद मिश्र के किसी वक्तव्य या भाषण का सार मेरी समझ में नहीं आया। अब जब वह जजमेंट लिखेंगे तो वह कैसा होगा? जहां तक जस्टिस विश्वगुरु की बात है वह तो फिर भी ठीक है पर उनका और डॉ चंद्रिका का जो आपसी लेन-देन श्री बेकर्स में हुआ करता है, क्या वह किसी जजमेंट को प्रभावित कर सकता है? उनका सबके साथ मिलना जुलना, राज की सारी बातें बोल देना, उसका असर क्या होगा? वे किस तरह पद और गोपनीयता की शपथ लेंगे? फिर जस्टिस अजायब सिंह, वह तो नेता लोगों के आस-पास ही रहते हैं, ऐसे में उनके द्वारा लिखे गए निर्णय कैसे होंगे? उनके बिजनेस पर इस नए पद का क्या असर पड़ेगा, आदि आदि, क्या उनको अपने आय व्यय का ब्यौरा भी देना पड़ेगा? रही बात रजिस्ट्रार डॉ चंद्रिका की, तो वह तो मुझे वैसे भी देखना नहीं चाहते, क्योंकि मैंने प्राचार्य रहते समय उनकी बहुत हाजिरी काटी है, वह क्यों मेरे पर रियायत करने लगे? वह भी तो अपने पेशकार से कह कर मेरे खिलाफ कोई भी मुकदमा दर्ज कर सकते हैं।
मैं सोचने लगा, प्रोफेसर शाह ही ठीक थे, तर्क आधारित जजमेंट करते, कानून के आदमी है, पर जे एन यू का दाग उन्हें …।
ट्रिन,ट्रिन,ट्रिन…ट्रिन,ट्रिन,ट्रिन। अचानक फिर फोन की घंटी बजी। देखा तो मित्रवर गोपाल पांडेय का फोन था, उठाया।
“नमस्कार सर, मैं आपसे बोला करता था ना कि सरकार के खिलाफ मत लिखा करिए, अब देखिए आपके लेखन के कारण ही बेंच गठित हो गई और यह बेंच खासकर पूर्वांचल के लेखकों पर नकेल कसेगी”, वह लगातार बोले जा रहे थे।
“अरे भाई, मैं तो बहुत छोटा लेखक हूं, मेरी कविताएं क्यों सरकार पढ़ेगी, उसे तो बहुत सारे आवश्यक काम है”, मैंने सफाई दी।
“यही तो आपकी अज्ञानता है” उन्होंने कहा “सरकार सब पर नजर रखती है, चाहे वह लेखक हो या कवि।”
मैं और घबरा गया क्योंकि इस समय सारे अभिन्न मित्र मुझे ही दोष दे रहे थे। समय, काल, परिस्थिति सब मेरे विपरीत थे, किसी भी कविता की पंक्ति मेरी सहायता के लिए नहीं आ रही थी। मेरे प्रेरणा पुंज महाकवि दिनकर दूर-दूर तक कहीं नजर नहीं आ रहे थे। यह निश्चित ही मेरे लिए एक बुरा दिन था, पर मैं कर ही क्या सकता था। मैंने फोन रखा, तौलिया लेकर गुसलखाने चल पड़ा, देखा तो बिजली नहीं थी, बाहर बरसात हो रही थी, बादल गरज रहे थे और मैं अंदर ही अंदर परेशान, कोई राह दिख नहीं पा रही थी। लग रहा था, अब मेरी खैर नहीं, यह बेंच कोर्ट शुरू होते ही मेरी गिरफ्तारी का वारंट जारी करेगी। सोचा, बधाई देने जाने से पहले डॉ विहान को फोन करूंगा, या प्रो सत्य त्रिपाठी को। फिर सोचने लगा कि डॉ विहान के साथ जाने में मेरी भलाई है क्योंकि वह मेरे छात्र रहे हैं, कुछ तो गुरु की सजा कम कराने में मेरी मदद करेंगे।
तौलिया टांग कर मैंने पानी भरा, सोचा, नहा ही लूं। जल्दी से ही एक मग पानी अपने सिर पर डाला। पानी अत्यधिक ठंडा था… पानी डालते ही… सारा परिदृश्य बदल गया। मैंने अपने आपको बिस्तर पर पाया। नींद खुल चुकी थी, घड़ी देखा, सुबह के पांच बज रहे थे, कोई बदलाव नहीं, मेरा कमरा भी वैसे का वैसा ही था, कहीं कोई बाल्टी नहीं, मग नहीं, पानी नहीं, मेरे हाथ मेरे सूखे बालों पर फिर रहे थे…सांसे तेज चल रही थी। सुकून मिला, कोई ऐसी बेंच गठित नहीं हुई थी। मैंने अवश्य कोई बुरा सपना देखा था, इसमें कोई संदेह नहीं था। मोबाइल देखा तो अनुज डॉ भूप और मित्र प्रो गोपाल पांडेय का कोई कॉल रिकॉर्ड नहीं था। मैंने प्रभु को स्मरण किया, धन्यवाद ज्ञापित किया कि उनका लेखकों पर इकबाल अभी भी बना हुआ था। मुड़ कर देखा तो देवरिया ठीक वैसे का वैसा था, कोई परिवर्तन नहीं, पूर्व की भांति ही सरल एवं सरस। चाय पी कर मैंने अपनी अलमारी से ए फोर साइज के चार पन्ने निकाले और फिर लिखने बैठ गया… नए कथानक और कुछ नए पात्रों की तलाश में।
शायद देवरिया की प्रतिष्ठा इसी में निहित थी ।