आओ मेरे पास आओ प्रियतमाअपनी खुशबू से मिलाओ प्रियतमाजानता मनुज मैं बेकार सा मैं हूंतुम मुझे चंदन बनाओ प्रियतमा। यूं तो फूलों पर बहुत से रंग आएभ्रमर के गीत भी कलियों को भाएजो फागुन के रंगो में होता सम्मिश्रणतुम वही मुझको लगाओ प्रियतमा। मैं वक्त को गजलें सुनाता रह गयातेरे रूप को भी ठीक से देखा नहींआज जागी मेरे मन की हररितिमातुम जिंदगी मेरी सजाओ प्रियतमा। संसार में मुझसा अनूठा कौन हैतुम जो पारस से...
मधुशाला
रातें कट गई गजलों में मेरीगीतों में दिवस बीत गएतेरी यादों में खो गया जबसेआज कितने बरस बीत गए। छेड़ दिया मन का तार फिरउस राग की तरन्नुम नेतेरी तलाश में फिरते हुएखुशबू के शहर रीत गए। तेरा साथ, रंगीली शामफिर लौटकर न आएगीकोशिशें लाख हों भुलाने कीदिल से अब याद कहां जाएगी? तुम मुझे सोचते होगेकिसी अनजान से शहर मेंमैं कविता में ढूंढता तुमकोतू मेरी मधु है, मधुशाला भी। जो फूलों और कलियों मेंखुशी का रंग...
पथिक
उठो भूमि पर पड़े पथिक तुमआगे बढ़ने के मतवालेबस कदमों के थक जाने सेराही नहीं रुका करते हैं। चलो क्षितिज की और चलेंआंधी का रुख मोड़ चलेंतूफानों के आ जाने परलक्ष्य नहीं बदला करते हैं। बस साधन है थकन तुम्हारीदृष्टि साध्य पर तानो फिर सेमन से हारे नहीं अगर होकौन तुम्हे हारा कहते हैं? जीवनलीला यह क्षणभंगुरदो पल का ही मेला साराकुछ फूलों के मुरझाने परउपवन कहां कभी रोते हैं? भले बिजलियां टूट पड़ेंघिर आएं...
मुस्कान
राह पर प्रस्थान फिर फिरमार्ग का अनुमान फिर फिरधूप हो या छांव फिर फिरगेह का निर्माण फिर फिर। कर नमन इन बाजुओं कास्वेद का कर दान फिर फिरकर्म पथ पर फिर भरोसाप्रारंभ हो श्रमदान फिर फिर। बस यही तो जिंदगी हैप्राप्ति का अरमान फिर फिरलक्ष्य पर संधान फिर फिरप्रेम का सम्मान फिर फिर। गर्दिशों की शाम जो होसुन ग़ज़ल की तान फिर फिरमरू हो या गुलशन कोई होनीड़ का निर्माण फिर फिर। ले मधु का जाम फिर फिरकर खुशी का...
अग्निपथ
अग्निपथ पर अटल रह हुंकार करजो भी आए सामने स्वीकार करकोई आग्रह या किसी याचना क्यामहाभारत सज गया है युद्ध कर। बहुत तुमने संस्कृति का भान रखाबहुत तुमने बंधुता का मान रखादूत भेजा शांति का प्रस्ताव रखाशत्रु पर अब अस्त्र का संधान कर। शिविर में विश्राम अब तू त्याग देवीर है तू युद्ध पर अब ध्यान देछोड़ कर निज हानि की चिंता सदालक्ष्य को अब ध्यान में अपने लगा। भूल जा संग्राम के परिणाम कोयाद तू अपने कुल के...
दक्खिन टोले का जिन्न
उन दिनों मैं गांव पर था। जाड़े को रात में दरवाजे पर अलाव के पास लोग बैठ जाते और बतकही चलती रहती, कभी राजनीति की, कभी बीबीसी पर चल रहे युद्ध के समाचार की, कभी गांव के छोटे मोटे झगड़ों की और कभी कुछ भूत प्रेत इत्यादि की भी। छोटी उम्र में राजनीति तो बिलकुल समझ नहीं आती थी पर राजनीतिक विषय पर जब दो लोग जोर जोर से आपस में वाकयुद्ध करने लगते तो मजा आ जाता, गर्माहट बढ़ जाती और रात का सन्नाटा कुछ कम हो...
जगेसर
ट्रिन! ट्रिन! ट्रिन! ट्रिन,! ट्रिन! ट्रिन! अचानक फोन की घंटी बज उठी। प्रो मकरंद त्रिपाठी चौंक कर उठे। रात के तीन बज रहे थे। इस समय कौन हो सकता है, सोचकर उनका मन चिंतित हो उठा, फोन उठाया तो जगेसर के बेटे चंदू का फोन था। चंदू लगातार रोए जा रहा था। उन्हें लगा जरूर कुछ अशुभ हुआ है। पूछा, “अरे चंदू, बता क्या हुआ?” उसने उन्हें जगेसर के देहांत की सूचना दी। उन्हें सुनकर बड़ा कष्ट हुआ, सहसा एक...
आदर्श ग्राम बिलरिया
पी! पी! पी। पी!…पी! पी। पी!..पी। पी! सुबह के पांच बज रहे थे, अचानक तीन सीटियां एक साथ बज उठी। शोर हुआ। “पकड़ो, पकड़ो, देखो भाग जा रहा है। “अरे देखो, इधर भी है गन्ने के खेत में। एक नहीं, दो है, उधर देखो, एक उधर भागा जा रहा है।” तीनों मास्टर, मंसाराम पांडे, सहज यादव और चंदू राम सीटी बजाते हुए बोले जा रहे थे। मोबाइल से भागते हुए लोगों की फोटो लेने की कोशिश भी हो रही थी और उनके साथ आए तीनों...
रिटर्न गिफ्ट
आप सोच रहे होंगे कि मैं जो लिखने जा रहा हूं किसी रिटर्न गिफ्ट के संबंध में है, पर जो मेरा अब तक का अनुभव है उससे तो यही लगता है कि हमें किसी रिटर्न गिफ्ट के मिलने में संशय है। हालांकि मेरा ब्लड ग्रुप बी पॉजिटिव है पर सभी बी पॉजिटिव वाले पॉजिटिव होंगे ही, इसकी कोई गारंटी नहीं। खासकर जब आंखें खुली हों। हां, आंखें बंद हो तो और बात है। अनुभव भी कम नहीं, क्योंकि इस साल अगस्त में मैं अपने जीवन के...
वेलकम टू पाटलिपुत्र
चलिए आज आपको कुछ पुराने दिनों से परिचित कराता हूं। पाटलिपुत्र से तो आप समझ ही गए होंगे कि मैं अपने प्रिय राज्य की बात कर रहा हूं क्योंकि यह नाम वहीं से संबंधित है, हां विरोधी पार्टी वाले कभी-कभी इसका नाम जंगलराज से जोड़ देते हैं, यह और बात है। जंगल में मंगल करना कोई हमसे सीखे, और इसके कुछ उदाहरण भी मैं आपको देता हूं। उस दिन मैं अपने गांव से बनारस जाने के लिए निकला था। गांव से थोड़ी दूर एक अन्य...