राजा विक्रमादित्य के देहावसान के बाद सदियां बीत चुकी थीं पर भारत में उनके द्वारा स्थापित की गई राज्य व्यवस्था अभी भी वैसे ही चल रही थी । उनके सिंहासन की बत्तीस पुतलियां अभी भी सिंहासन में जड़ी हुई थीं और उनके लिए राजा की परीक्षा लेना रूटीन कार्य हो चुका था। राजा आते, जाते, फिर नए आते, सदियों से यही चल रहा था। उनके मन मस्तिष्क में धीरे धीरे एक उदासी ने घर बना लिया था। हां, नए राजा के आने के पश्चात...
वाल्टर स्मिथ का भूत
उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में गंगा किनारे एक गांव है रानीगंज । उस गांव के उत्तरी छोर पर एक विशाल सेमर का वृक्ष है। बड़े बूढ़े उसे भुतहा कहते थे। उसकी डालियां करीब चालीस पचास मीटर तक फैली थीं। जड़ें भी बहुत मजबूत, तने से आगे की ओर विस्तार लिए हुए। बहुत सारे पक्षी उसकी कोटरों में आश्रय लिए हुए थे। पास से ही गांव की ओर आने वाली सड़क गुजरती थी। दिन में तो मजबूरीवश राहगीर उस रास्ते आते जाते पर शाम के...
कागज का पेट
डॉ शिवकुमार अपनी कक्षा लेकर वापस आ अपने कमरे में बैठे ही थे कि उन्हें अनुचर ने एक महत्वपूर्ण बैठक की याद दिलाई। बैठक आइक्यूएसी की थी और यह बैठक उन्होंने ही बुलाई थी। विगत कई वर्षों से वह आइक्यूएसी समन्वयक के रूप में कार्य कर रहे थे और उन्होंने विभिन्न प्रवक्ताओं का प्रमोशन भी पूरे मनोयोग से कराया था। बैठक का एजेंडा नया यूजीसी नियमन निश्चित था जिसके अनुसार अब शिक्षकों का प्रोफेसर पद पर प्रमोशन...
सब मोबइलवे में बाऽ
आज कहानी प्रारंभ करने के पहले मोबाइल देवता को नमन कर लेता हूं क्योंकि यह कहानी उन्हीं पर है। आपको याद होगा गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में सबसे पहले देवताओं की वंदना की है, फिर बाद में स्वांत: सुखाय पर बात खत्म की है। आज का विषय कुछ ऐसा ही है, कभी-कभी तो मुझे लगता है कि मोबाइल देवता कलयुग में साक्षात परमेश्वर के अवतार है क्योंकि धरती पर किसी देवता के आने का प्रभाव सभी मनुष्यों पर पड़ता है।...
मलाल
कितने चले गए, कितने बिछड़ गएयह मलाल रह गया, कि गले न लग सकेइस राह चलते चलते, कई हमसफर मिलेयह मलाल रह गया, कि अपने न बन सके। कितनों के साथ अपनी कुछ रंजिशें रहींयह मलाल रह गया, न मसले सुलझ सकेफिर से अगर जुड़े भी बरसों से टूटे रिश्तेयह मलाल रह गया, कि वैसे न रह सके। कितने हसीन पल भी आ कर निकल गएयह मलाल रह गया, क्यों ना संजो सके?वह पल कभी न लौटा, जो आकर गुजर गयायह मलाल रह गया, कि हम देखते रहे। अपनी...
हिन्दी
मैं हिन्दी हूं, मैं हिन्दी हूंमैं भारत मां की बिंदी हूंजो सदा सुशोभित वसुधा परमैं शब्दों की कालिंदी हूं।
है ओज रहा परिचय मेराहै जोश सदा सहचर मेरामैं जिह्वा की आनंदी हूंमैं हिन्दी हूं, मैं हिन्दी हूं।
मैं भावों का सुंदर संयोजनभारत का ऊर्जित संबोधनसंस्कृतियों की मैं संधि हूंमैं हिन्दी हूं, मैं हिन्दी हूं।
बुडुआ
‘बुडुआ’ भोजपुरी भाषा का शब्द है जो बच्चों को डराने हेतु पूर्वांचल के गांवों में खूब प्रयोग किया जाता है। यह न भूत है न प्रेत है और न जिन्न ही है। यह तालाब के पानी में रहता है और रात को राह चलते राहगीरों को तालाब में डूबा कर मार डालता है। बुडुआ के डुबाए हुए लोग बुडुआ ही बनते हैं और इस तरह उनका समूह बढ़ता रहता है क्योंकि कोई और ऑप्शन है ही नहीं। सहोदर चाचा के अनुसार इनका रंग सफेद होता...
ये और बात है
ये और बात है कि मैं कुछ नहीं कहता तुमकोइस नए शौक के कुछ तो मायने होंगे।
लोग मजमून जान लेते थे कभी लिफाफे सेतुम कौन सुखनवर हो की अंजान बने रहते हो?
वह भी एक दौर था जब दिलों पर ताले कम थेअब गुजारिश है कि हवा को तो हवा रहने दो।
नशे का वक्त है शायद होश कहां अब मुमकिनयह मेरी जिद है कि पहचान बनी रहती है।
मेरी जुबान तू सच कहने में डरती क्यों हैतोहमत ए दाग से तो चांद भी न बच पाया है।
जब चलते चलते रात हुई
जब चलते-चलते रात हुईइन छालों से कुछ बात हुईमंजिल का था पता नहींकुछ आंखों से बरसात हुईथक कर बैठा था मनुज मौनजुगनू बोला रोता है कौन?छोड़ो तुम सारी चिंताएंबीता जो कल की बात हुईआंसू क्यों व्यर्थ बहाते होबाधाओं से घबराते हो? आओ मैं तेरी थकन हरूंअपने मन कि बात कहूंरातों के घने अंधेरे मेंजब जलता कोई दीप नहींपदचिन्हों की हर रेख मौनकिससे पूछेगा राह कौन?जब तारों पर छाते बादलतूफान हो गया हो पागलतब भी आशाएं...
चल चलीं गांव की ओरिया
चल चलीं गांव की ओरिया…कि मन भरल रहत शहरियारहत शहरिया हो, करत नोकरियाकि मन भरल रहत शहरिया…कि चल चलीं गांव की ओरिया। जहवां पर बीतल हो बचपन के दिनवांजहवां पर लागेला सावन में झुलनवांजहवां पर तोहर घर दुआर हो…कि चल चलीं गांव की ओरिया। नौकरी पर मेठ लोग रोज धमकावेपाई पाई जोरि सब चऊका चलावेमहंग भईल दुई जून रोटिया…कि चल चलीं गांव की ओरिया। राहि देखत सूखि गइलें अखियां के पनियांमाई बाप याद करें तोहर...