जो नहीं खिले थे गुल कभीवो भी इस बहार में खिल गएजब तुम हो मुझको आ मिलेमेरे अंदाज ही हैं बदल गए। जो उजाले मेरी राह परकभी भूल कर भी गए नहींवो हैं खुद ही आकर पूछतेकि हम किधर को निकल गए? जो पहले थी आवारगीवो है ताजगी में बदल गईजो भी जिंदगी से मलाल थेवो रफ्ता रफ्ता संवर गए। जो थे सहमे सहमे थके थकेउन हौसलों में उड़ान हैजो भी गमों के दयार थेवो गज़ल बन के निखर गए। अब दश्त क्या, खिजां है क्या?मुझे कोई भी...