जो न मिला सोचकर के क्या होगा?एक नए गम का सिलसिला होगा। मंजिलें और भी तो हैं मुमकिनआदमी और भी रवां होगा। फूल गर गिर गए हैं शाखों सेपुष्परज वहीं पर गिरा होगा। चमन में फ़स्ल-ए-गुल के आते हीनई कलियों का सिलसिला होगा। लकीरें खींच ले नई खुद हीलकीरें खोजने से क्या होगा? रंज का वक्त कबका बीत गयाजख्म की सोचने से क्या होगा? अंधेरे जगनुओं से हार गएरौशनी खोजने से क्या होगा? राह पर आगे को कदम तो बढ़ासिर्फ बस...