पढ़ लिख के सुगना पिंजड़वा के तोड़ द
जवने बा अन्हार के बंधन सगरो उजाड़ द।
बाप के जिनगिया बीतल रोटी के जोगाड़ में
बहुत रात माई सुतली मन के उजाड़ में
सगरो आपन सुख भूललें फीस के जुटान में
कईसे तू भुला गईल ई शहर के बाजार में?
पढ़ लिख के सुगना पिंजड़वा के तोड़ द
जवने बा अन्हार के बंधन सगरो उजाड़ द।
जवन बा हथेली पे लिखल ऊहो बदल जाला
करम से त बंजर में भी अंकुर हो जाला
हार माने ऊहो कवनो अदमी कहाला?
उठs उठs मरम बुझs राति आ बिहान के।
पढ़ लिख के सुगना पिंजड़वा के तोड़ दs
करि ल तू आपन करम जीवन सुधार दs।
माटी के तू पालल मनई माटीए संसार हो
ई जिनगी ही सबके परीक्षा परब त्यौहार हो
ज्ञाने मुक्ति बा जीवन के ज्ञाने अधार हो
मूरख ही रहे के बा कि होबs समझदार हो।
पढ़ लिख के सुगना पिंजड़वा के तोड़ दs
करि ल तू आपन करम जीवन सुधार दs।
केहु नाहिं छोट आ बड़ सभे बा बराबर
कर्म से ही केहू पावे ज्ञानीजन में आदर
वाल्मीकि भरि दिहलें ज्यों रामायण में सागर
वत्सल कहलें तूहूं करs जीवन पर बिचार हो।
पढ़ लिख के सुगना पिंजड़वा के तोड़ दs
करि ल तू आपन करम जीवन सुधार दs।