बहता रहा सदा ही नदी की धार में जैसे
कुछ हाथ में था ही नहीं पतवार के जैसे।
करता रहा सफर एक अनजानी डगर पर
जिस राह पर कोई न निकला था बसर पर।
तिनका हूं मेरे हाथ में कुछ भी तो नहीं है
नजरों में दूर दूर तक कोई भी नही है।
बस मान लिया मैने कि तू साथ खड़ा है
तबसे मेरा अंदाजे-बयां सबसे जुदा है।
मालूम नहीं पंक्तियां ये कौन लिख रहा
चुपचाप खड़ा देखता कागज़ सिमट रहा।
कोई गज़ल भी मुझमें है सोचा ही नहीं था
एक गीत कभी मैंने गाया भी नही था।
आगे का तू ही जाने मेरा कैसा मुकद्दर
कोई मुकाम भी है या गुमनाम रहूंगा?
क्या लिखेगा मेरा नाम कभी पानी पर
लोग को रस्क होगा कभी मेरी कहानी पर?