जा के फिर जिंदगी नहीं आई
वो गई और फिर नहीं आई।
हर शहर ढूंढ लिया हर मोड़ पे तलाशा उसको
जो खुशबू पास से गुजरी, फिर नहीं आई।
उसका मधुमास सा आना मेरे पतझड़ में
वैसी पछुए में पुरवाई, फिर नहीं आई।
अब तो खुशबू के सारे शहर जैसे रीत गए
महक कुछ ऐसी करिश्माई, फिर नहीं आई।
प्यास बढ़ती ही रही पर वो प्याला न मिला
प्यार में ऐसी तवानाई, फिर नहीं आई।
मौसमों का भी कोई रंग न देखा ऐसा
वैसी सर्दी में गरमाई, फिर नहीं आई।
रूप था, रंग था, और भी बहुत कुछ था
वो मेरी याद में छाई, फिर नहीं आई।
उसने पैमाना मेरा पास ला के खींच लिया
ऐसे मौके की उलझाई, फिर नहीं आई।
जा के फिर जिंदगी नहीं आई
वो गई और फिर नहीं आई।