पीपल जाते कह गया, मत करना अब बात
कितने दिवस आए नहीं, तुम भी तो मेरे पास?
भूल गए मैना गौरैया, भूले शुक चितचोर
भूल गई है कोयल भी, भूल गए सब मोर।
पनघट मुझसे रूठ गया, लेता है मुंह को फेर
नदिया भी अब पास नहीं, मांझी न गाता टेर।
गोधूली भी स्वप्न हो गईं, दिखे न कोई ढोर
चरवाहे अब भूल गए, आना ही इस ओर।
भूल गए हैं मर्कट भी, करते थे जो किल्लोल
भूल गईं हैं गिलहरियां, जो दौड़ा करतीं रोज।
मैं साथी तेरे पुरखों का, देखा सब इतिहास
तुम मुझको भी भूल गए, तुमसे कैसी आस?
ऋषि बैठे आ मेरी छाँव में, चिंतन में तल्लीन
कितने बुद्ध औ महावीर, आए थे युग प्राचीन।
धर्मों की कितनी धाराएं, फैली लंका चीन
देश रहे परदेश रहे, सब बनीं सृजन की नींव।
विस्मृति की आई बीमारी, हरसु छा गया मौन
जिसने पाला था साँसें दे, उसे याद करेगा कौन?
डालों में अब ताकत कम है, पत्तियां हो गईं श्वेत
कोई जड़ ना वृक्ष बनेगी, जब फैली गई है रेत।
विदा करो ऐ मेरे परिजन, चलूं मुक्ति की ओर
दिवसों से राहें तकने में, है टूटी मन की डोर।
पीपल जाते कह गया, मत करना अब बात
कितने दिवस आए नहीं, तुम भी तो मेरे पास?