कितने बदल गए हम भी
प्यास ही जिंदगी कर ली
मौसम से रंज कर बैठे
और फूलों से दोस्ती कर ली।
क्या मिला, न मिला, देखे कौन?
कौन इतना हिसाब कर डाले
है फुर्सत किसे जो वणिकों सा
अपना मिज़ाज कर डाले?
जफ़ा वाले सोच में रहते
कि पत्थर का जवाब पत्थर है
मैंने रिवायत पलट कर रख डाली
फूलों में जवाब कर डाला।
लगा लो मिल्कियत का हिसाब
मैंने पलड़े ग़ज़ल को रख डाला
तुम जो चाहो तुम रख डालो
मैंने अपनी शग़ल को रख डाला।
अब देखें कहां ले जाता हुनर
नदी की धार में कश्ती
और पतवार उसके हाथों में
उसकी ही बंदगी कर डाली।
अब तो वही शेर कहता है
मैं तो बस कागज निकाल लेता हूं
और फिर सिर झुकाए रहता हूं
जाने कब खुदा उतर आए?