माटी के लोगवा, रहि गईलें झोपड़िये में
सेठ साहूकार लूटि गईलें रे बिदेशिया।
खेतवा में सब दिन, खटेला जे मारे मारे
केहू ओके सुधियो ना लिहलें रे बिदेशिया।
सबके अटरिया बनत गईलें दसो माला
गरीबन के बतिया भूलईलें रे बिदेसिया।
जेठ दुपहरिया में तियना बेचत रहे
बुढिया नयन भरि लोर रे बिदेसिया।
छोटे छोट लईका कागजे बीनत देखलीं हो
कहला पर केहू ना पतियाई रे बिदेसिया।
राम के देसवा में भूखल नंगा लोग अबो
गांधी के सपनवां का भईल रे बिदेसिया?
भारत के देशवा हिंदुए जन सभे लोग
जतिए के सभे बा बंटाईल रे बिदेसिया।
जे बोले झूठे रोजे, मिले ओके मान फूल
‘वत्सल’ ठगल रहि गईलें रे बिदेसिया।