आज कहानी प्रारंभ करने के पहले मोबाइल देवता को नमन कर लेता हूं क्योंकि यह कहानी उन्हीं पर है। आपको याद होगा गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में सबसे पहले देवताओं की वंदना की है, फिर बाद में स्वांत: सुखाय पर बात खत्म की है। आज का विषय कुछ ऐसा ही है, कभी-कभी तो मुझे लगता है कि मोबाइल देवता कलयुग में साक्षात परमेश्वर के अवतार है क्योंकि धरती पर किसी देवता के आने का प्रभाव सभी मनुष्यों पर पड़ता है।...
लौटि आव गऊंआ
भूले सजन लौटि आवs अब गऊंआलौटि आवs गऊंआ हो आवs हमरे गऊंआंहोए फेर तोहरो दर्शनवां हो रामालौटि आवs गऊंआं। गऊंआ के सोना माटी सरसो फूलाइलमहुआ भी चदरा अस भुईंयां बिछाइलफागुन के आवेला सपनवां हो रामालौटि आवs गऊंआं। जबसे तू गईल पतियो न भेजलअबला बियाहल के सुध बिसरवलकइसन बा तोहरो करेजवा हो रामा?लौटि आवs गऊंआं। अबकि जे अईबो त लौटि न पईबोनेहवा के डोर तोसे अईसन लगईबोगऊंएं में बसिहें परनवां हो रामालौटि आवs...
बुडुआ
‘बुडुआ’ भोजपुरी भाषा का शब्द है जो बच्चों को डराने हेतु पूर्वांचल के गांवों में खूब प्रयोग किया जाता है। यह न भूत है न प्रेत है और न जिन्न ही है। यह तालाब के पानी में रहता है और रात को राह चलते राहगीरों को तालाब में डूबा कर मार डालता है। बुडुआ के डुबाए हुए लोग बुडुआ ही बनते हैं और इस तरह उनका समूह बढ़ता रहता है क्योंकि कोई और ऑप्शन है ही नहीं। सहोदर चाचा के अनुसार इनका रंग सफेद होता...
ये और बात है
ये और बात है कि मैं कुछ नहीं कहता तुमकोइस नए शौक के कुछ तो मायने होंगे।
लोग मजमून जान लेते थे कभी लिफाफे सेतुम कौन सुखनवर हो की अंजान बने रहते हो?
वह भी एक दौर था जब दिलों पर ताले कम थेअब गुजारिश है कि हवा को तो हवा रहने दो।
नशे का वक्त है शायद होश कहां अब मुमकिनयह मेरी जिद है कि पहचान बनी रहती है।
मेरी जुबान तू सच कहने में डरती क्यों हैतोहमत ए दाग से तो चांद भी न बच पाया है।
जब चलते चलते रात हुई
जब चलते-चलते रात हुईइन छालों से कुछ बात हुईमंजिल का था पता नहींकुछ आंखों से बरसात हुईथक कर बैठा था मनुज मौनजुगनू बोला रोता है कौन?छोड़ो तुम सारी चिंताएंबीता जो कल की बात हुईआंसू क्यों व्यर्थ बहाते होबाधाओं से घबराते हो? आओ मैं तेरी थकन हरूंअपने मन कि बात कहूंरातों के घने अंधेरे मेंजब जलता कोई दीप नहींपदचिन्हों की हर रेख मौनकिससे पूछेगा राह कौन?जब तारों पर छाते बादलतूफान हो गया हो पागलतब भी आशाएं...
सुप्रीम कोर्ट ऑफ देवरिया
ट्रिन,ट्रिन,ट्रिन…ट्रिन,ट्रिन,ट्रिन…ट्रिन,ट्रिन! अचानक फोन की घंटी बजी। मैं सो रहा था । घड़ी देखा तो रात के तीन बज रहे थे, मैं सोचने लगा, इस समय कौन हो सकता है? चिंता हो गई, कहीं कोई अशुभ समाचार तो नहीं, या कोई मदद के लिए बुला तो नहीं रहा? हड़बड़ा कर उठा, मोबाइल की घंटी अभी भी बज रही थी, उठाकर देखा तो डॉ भूप की कॉल थी। घबरा कर फोन उठाया, पूछा “अरे भाई क्या हुआ?” “उठिए भैया, आपको पता...
चाणक्य की पाटलिपुत्र यात्रा
चाणक्य अपने कक्ष में विश्राम कर रहे थे तभी अनुचर ने उन्हें उनके शिष्य चंद्रगुप्त के आने की सूचना दी। स्वर्ग में उन्हें रहते सदियां बीत चुकी थीं । चंद्रगुप्त पास के प्रांगण में रहते थे, पूर्व में जब कभी उनका गुरु से मिलने का मन होता तो सूचना आ जाती, आखिरकार वह पाटलिपुत्र के पूर्व सम्राट थे । मिलने पर वे दर्शन, साहित्य और राजनीति की चर्चा करते, कुछ पुस्तकों की भी चर्चा करते। धरती से कभी-कभार ही कोई...
चल उड़ जा रे पंछी
सितंबर का महीना दो दिन पहले शुरू हुआ था। कुलपति महोदय के आदेशानुसार महाविद्यालय सभागार में छात्र छात्राओं को नई शिक्षा नीति से परिचित कराया जा रहा था। प्राचार्य मकरंद त्रिपाठी एवं प्रोफेसर नवनीत सिंह कुछ फाइलें लेकर मंच पर आसीन थे। वह आपस में नई शिक्षा नीति के अंग्रेजी संस्करण को सामने रखकर कुछ चर्चा कर रहे थे। अंग्रेजी संस्करण के कारण उन्हें उसे ठीक से समझने में बड़ी दिक्कत हो रही थी परंतु उनके...
दीपक
वह दीपक मुझे बुलाता हैविकराल तिमिर के बिंब बीचमुझको लड़ना सिखलाता हैवह मुझमें आस जगाता हैवह दीपक मुझे बुलाता है। कैसे एक जरा सी लौलड़ती घनघोर अंधेरे से?दृढ़ निश्चय की बाती परअपने कदम टिकाता हैवह दीपक मुझे बुलाता है। मुझमें है उसका अंश कोईमेरा उससे संबंध कोईजब स्वप्नों का हो अनस्तित्ववह मुझमें स्वप्न जगाता हैवह दीपक मुझे बुलाता है। निश्चित है लड़ना होगा हीजब भी कोई निःशब्द हुआकोई बेड़ी में जकड़ा...