जीयेs भोजपुरिया हो, जीयेs हो पुरबियाबसs चाहे जाई कौनो देशsआपन ई बोलीया भुलईहs न कबो रामाकेतनो अलग परिवेश। माटी के रंगवा रंगाइल ई बोलिया होमहके जा के हर देसडांटि के जो बोले केहू तबो लागे मीठे मीठतनिको लागे नाहिं ठेस। होलिया दिवलिया में गाईं भोजपुरियालागेला पुरबिये के तानमनवां में लागे जैईसे एही में जीनगीएही में सांझि आ बिहान। हमके त लागे जईसे एही में पीपरएही में कोईलिया के बानएही में ऊ सरसो पियर...
जब चलते चलते रात हुई
जब चलते-चलते रात हुईइन छालों से कुछ बात हुईमंजिल का था पता नहींकुछ आंखों से बरसात हुईथक कर बैठा था मनुज मौनजुगनू बोला रोता है कौन?छोड़ो तुम सारी चिंताएंबीता जो कल की बात हुईआंसू क्यों व्यर्थ बहाते होबाधाओं से घबराते हो? आओ मैं तेरी थकन हरूंअपने मन कि बात कहूंरातों के घने अंधेरे मेंजब जलता कोई दीप नहींपदचिन्हों की हर रेख मौनकिससे पूछेगा राह कौन?जब तारों पर छाते बादलतूफान हो गया हो पागलतब भी आशाएं...
चल चलीं गांव की ओरिया
चल चलीं गांव की ओरिया…कि मन भरल रहत शहरियारहत शहरिया हो, करत नोकरियाकि मन भरल रहत शहरिया…कि चल चलीं गांव की ओरिया। जहवां पर बीतल हो बचपन के दिनवांजहवां पर लागेला सावन में झुलनवांजहवां पर तोहर घर दुआर हो…कि चल चलीं गांव की ओरिया। नौकरी पर मेठ लोग रोज धमकावेपाई पाई जोरि सब चऊका चलावेमहंग भईल दुई जून रोटिया…कि चल चलीं गांव की ओरिया। राहि देखत सूखि गइलें अखियां के पनियांमाई बाप याद करें तोहर...
फिर खिलेंगे फूल प्रियतम
फिर खिलेंगे फूल प्रियतमफिर से होगी भोरआस की किरण जगेंगीमधुमास में चहूं ओर। रातरानी फिर करेगीनींद से मुंहजोरमोगरे पर फिर से होंगेभ्रमर, रस के चोर। सुख-दुख लिखे हैं नियति मेंज्यों दिवस में अवसानरात का होना निरंतरहै सुबह का सम्मान। सुख परखता आदमी केकर्म को, संज्ञान कोदुख परखता आत्मबल कोतेज को, अभिमान को। क्या मनुज जो रो रहा हैअल्प से ठहराव मेंक्या मनुज जो दुखी होकरडूबता अवसाद में। क्या हुआ जो आज...
सुप्रीम कोर्ट ऑफ देवरिया
ट्रिन,ट्रिन,ट्रिन…ट्रिन,ट्रिन,ट्रिन…ट्रिन,ट्रिन! अचानक फोन की घंटी बजी। मैं सो रहा था । घड़ी देखा तो रात के तीन बज रहे थे, मैं सोचने लगा, इस समय कौन हो सकता है? चिंता हो गई, कहीं कोई अशुभ समाचार तो नहीं, या कोई मदद के लिए बुला तो नहीं रहा? हड़बड़ा कर उठा, मोबाइल की घंटी अभी भी बज रही थी, उठाकर देखा तो डॉ भूप की कॉल थी। घबरा कर फोन उठाया, पूछा “अरे भाई क्या हुआ?” “उठिए भैया, आपको पता...
मान मेरा है यह वतन मेरा
मैं रहूं ना रहूं वतन मेरातू रहेगा यही जतन मेराव्यर्थ ही आंधियों से डरते होअमिट एहसास है वतन मेरा। माना हम आज कुछ परेशां हैआज आंखों में कुछ नमी सी हैकल तो अपना है यह गुमाना हैअनगिनत दौरे ऐसे गुजरे हैंऔर निखरा है यह वतन मेरा। मुश्किलों में ही परख होती हैकौन कब तलक हमकदम होगाजब भी कुछ बेबसी का मंजर होफिर से उभरा है यह वतन मेरामान मेरा है यह वतन मेरा। कौन कहता है चांद चलता हैकौन कहता है गुलों में रंग...
दीपक
वह दीपक मुझे बुलाता हैविकराल तिमिर के बिंब बीचमुझको लड़ना सिखलाता हैवह मुझमें आस जगाता हैवह दीपक मुझे बुलाता है। कैसे एक जरा सी लौलड़ती घनघोर अंधेरे से?दृढ़ निश्चय की बाती परअपने कदम टिकाता हैवह दीपक मुझे बुलाता है। मुझमें है उसका अंश कोईमेरा उससे संबंध कोईजब स्वप्नों का हो अनस्तित्ववह मुझमें स्वप्न जगाता हैवह दीपक मुझे बुलाता है। निश्चित है लड़ना होगा हीजब भी कोई निःशब्द हुआकोई बेड़ी में जकड़ा...