उन दिनों मैं गांव पर था। जाड़े को रात में दरवाजे पर अलाव के पास लोग बैठ जाते और बतकही चलती रहती, कभी राजनीति की, कभी बीबीसी पर चल रहे युद्ध के समाचार की, कभी गांव के छोटे मोटे झगड़ों की और कभी कुछ भूत प्रेत इत्यादि की भी। छोटी उम्र में राजनीति तो बिलकुल समझ नहीं आती थी पर राजनीतिक विषय पर जब दो लोग जोर जोर से आपस में वाकयुद्ध करने लगते तो मजा आ जाता, गर्माहट बढ़ जाती और रात का सन्नाटा कुछ कम हो...
जगेसर
ट्रिन! ट्रिन! ट्रिन! ट्रिन,! ट्रिन! ट्रिन! अचानक फोन की घंटी बज उठी। प्रो मकरंद त्रिपाठी चौंक कर उठे। रात के तीन बज रहे थे। इस समय कौन हो सकता है, सोचकर उनका मन चिंतित हो उठा, फोन उठाया तो जगेसर के बेटे चंदू का फोन था। चंदू लगातार रोए जा रहा था। उन्हें लगा जरूर कुछ अशुभ हुआ है। पूछा, “अरे चंदू, बता क्या हुआ?” उसने उन्हें जगेसर के देहांत की सूचना दी। उन्हें सुनकर बड़ा कष्ट हुआ, सहसा एक...
आदर्श ग्राम बिलरिया
पी! पी! पी। पी!…पी! पी। पी!..पी। पी! सुबह के पांच बज रहे थे, अचानक तीन सीटियां एक साथ बज उठी। शोर हुआ। “पकड़ो, पकड़ो, देखो भाग जा रहा है। “अरे देखो, इधर भी है गन्ने के खेत में। एक नहीं, दो है, उधर देखो, एक उधर भागा जा रहा है।” तीनों मास्टर, मंसाराम पांडे, सहज यादव और चंदू राम सीटी बजाते हुए बोले जा रहे थे। मोबाइल से भागते हुए लोगों की फोटो लेने की कोशिश भी हो रही थी और उनके साथ आए तीनों...
रिटर्न गिफ्ट
आप सोच रहे होंगे कि मैं जो लिखने जा रहा हूं किसी रिटर्न गिफ्ट के संबंध में है, पर जो मेरा अब तक का अनुभव है उससे तो यही लगता है कि हमें किसी रिटर्न गिफ्ट के मिलने में संशय है। हालांकि मेरा ब्लड ग्रुप बी पॉजिटिव है पर सभी बी पॉजिटिव वाले पॉजिटिव होंगे ही, इसकी कोई गारंटी नहीं। खासकर जब आंखें खुली हों। हां, आंखें बंद हो तो और बात है। अनुभव भी कम नहीं, क्योंकि इस साल अगस्त में मैं अपने जीवन के...
वेलकम टू पाटलिपुत्र
चलिए आज आपको कुछ पुराने दिनों से परिचित कराता हूं। पाटलिपुत्र से तो आप समझ ही गए होंगे कि मैं अपने प्रिय राज्य की बात कर रहा हूं क्योंकि यह नाम वहीं से संबंधित है, हां विरोधी पार्टी वाले कभी-कभी इसका नाम जंगलराज से जोड़ देते हैं, यह और बात है। जंगल में मंगल करना कोई हमसे सीखे, और इसके कुछ उदाहरण भी मैं आपको देता हूं। उस दिन मैं अपने गांव से बनारस जाने के लिए निकला था। गांव से थोड़ी दूर एक अन्य...
पुतलियों के प्रश्न
राजा विक्रमादित्य के देहावसान के बाद सदियां बीत चुकी थीं पर भारत में उनके द्वारा स्थापित की गई राज्य व्यवस्था अभी भी वैसे ही चल रही थी । उनके सिंहासन की बत्तीस पुतलियां अभी भी सिंहासन में जड़ी हुई थीं और उनके लिए राजा की परीक्षा लेना रूटीन कार्य हो चुका था। राजा आते, जाते, फिर नए आते, सदियों से यही चल रहा था। उनके मन मस्तिष्क में धीरे धीरे एक उदासी ने घर बना लिया था। हां, नए राजा के आने के पश्चात...
वाल्टर स्मिथ का भूत
उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में गंगा किनारे एक गांव है रानीगंज । उस गांव के उत्तरी छोर पर एक विशाल सेमर का वृक्ष है। बड़े बूढ़े उसे भुतहा कहते थे। उसकी डालियां करीब चालीस पचास मीटर तक फैली थीं। जड़ें भी बहुत मजबूत, तने से आगे की ओर विस्तार लिए हुए। बहुत सारे पक्षी उसकी कोटरों में आश्रय लिए हुए थे। पास से ही गांव की ओर आने वाली सड़क गुजरती थी। दिन में तो मजबूरीवश राहगीर उस रास्ते आते जाते पर शाम के...
कागज का पेट
डॉ शिवकुमार अपनी कक्षा लेकर वापस आ अपने कमरे में बैठे ही थे कि उन्हें अनुचर ने एक महत्वपूर्ण बैठक की याद दिलाई। बैठक आइक्यूएसी की थी और यह बैठक उन्होंने ही बुलाई थी। विगत कई वर्षों से वह आइक्यूएसी समन्वयक के रूप में कार्य कर रहे थे और उन्होंने विभिन्न प्रवक्ताओं का प्रमोशन भी पूरे मनोयोग से कराया था। बैठक का एजेंडा नया यूजीसी नियमन निश्चित था जिसके अनुसार अब शिक्षकों का प्रोफेसर पद पर प्रमोशन...
सब मोबइलवे में बाऽ
आज कहानी प्रारंभ करने के पहले मोबाइल देवता को नमन कर लेता हूं क्योंकि यह कहानी उन्हीं पर है। आपको याद होगा गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में सबसे पहले देवताओं की वंदना की है, फिर बाद में स्वांत: सुखाय पर बात खत्म की है। आज का विषय कुछ ऐसा ही है, कभी-कभी तो मुझे लगता है कि मोबाइल देवता कलयुग में साक्षात परमेश्वर के अवतार है क्योंकि धरती पर किसी देवता के आने का प्रभाव सभी मनुष्यों पर पड़ता है।...
मलाल
कितने चले गए, कितने बिछड़ गएयह मलाल रह गया, कि गले न लग सकेइस राह चलते चलते, कई हमसफर मिलेयह मलाल रह गया, कि अपने न बन सके। कितनों के साथ अपनी कुछ रंजिशें रहींयह मलाल रह गया, न मसले सुलझ सकेफिर से अगर जुड़े भी बरसों से टूटे रिश्तेयह मलाल रह गया, कि वैसे न रह सके। कितने हसीन पल भी आ कर निकल गएयह मलाल रह गया, क्यों ना संजो सके?वह पल कभी न लौटा, जो आकर गुजर गयायह मलाल रह गया, कि हम देखते रहे। अपनी...