जिंदगी सरपट गुजरती जा रही है
जैसे कोई हो रेलगाड़ी
आ भी रहे हैं लोग
जा भी रहे हैं लोग
हर आदमी अपने मरासिम जी रहा है।
सभी जल्दी में कितने आजकल हैं?
रिश्ते भी दूरभाषी हो गए हैं
इच्छाएं स्वप्न में अब ढल रहीं हैं
दूरियां तो मिट गईं भूगोल की
पर उम्मीदें कितनी खाली हो गईं हैं।
सुबह से शाम तक हम राह तकते
कहीं मुस्कान में छल है
कहीं पहचान दुर्बल है
एक दूसरे से अब किनारा हो गया है
आदमी टूट कर कितना बेचारा हो गया है।