चापलूसी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है जोर कितना साहिबे-मसनद में है?
हमने देखा उनके पैरों में हैं छाले हो गए
हम तुरत ही आ के उनकी मरहम पट्टी कर गए।
हमने देखा उनके घर में सब्जी की किल्लत हुई
अगले पल ही सब्जीमंडी अपनी भी आदत हुई।
उनके बालों में यकायक जो सफेदी आ गई
हमको भी सहसा सफेदी की वो लज्जत भा गई।
हम तो चंपी करने में भी खुद बड़े मशहूर हैं
दिन रहे या रात को ही साहब बुलाते खूब हैं।
उनका मुखड़ा हो या दुखड़ा हमने है अपना लिया
उनके दफ्तर ने हमारा रोज ही वेलकम किया।
उनकी सेहत की फिकर हमको बहुत रहती है यार
एक हम हैं, एक वो हैं, तुम न समझोगे ये प्यार।
रात को हम दिन कहेंगे और दिन को रात भी
यही है अपना मुकद्दर है यही उल्लास भी।
बस इसी ही एक गुण से हरसु हमारा राज है
कोई दफ्तर या न मंत्री इससे अछूता आज है।
जो न समझेंगे जमाने की बदलती इल्तिजा
अब यही है आगे बढ़ने की अकेली इब्तिदा।
अब ना रुकेंगे हम यहां देखो बुलावा आ गया
उनकी खिड़की से अभी वो मातहत चिल्ला गया।
आओ जल्दी दौड़ कर साहब के बदन में दर्द है
दोनों हाथों मालिश करना ही हमारा फर्ज है।
चापलूसी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है जोर कितना साहिबे-मसनद में है?