एक फिल्मी गाना कुछ वर्षों पहले आया था जिसका मुखड़ा कुछ “डांस पे चांस मार ले” से शुरू होता है। उस समय तो इसका मतलब मुझे समझ नहीं आया कि गायक कहना क्या चाहता है पर इसका अर्थ मुझे अब समझ में आया है।’डांस पे चांस मार ले’ गाना तो उनके लिए था जिन्हें डांस आता हो पर जिन्हें डांस का कुछ भी नहीं आता वे क्या करेंगे, गाना लिखने वाले को ये अवश्य सोचना चाहिए था। वैसे आजकल शादियों का मौसम चल रहा है और हर शादी में डांस भी जोरदार ढंग से देखने को मिल रहा है। नौजवान प्रसन्न हैं, वह कभी नागिन डांस, कभी मुर्गा डांस, कभी पलटू डांस, कभी कौवा डांस, कभी लुंगी डांस और तमाम अन्य तरह के डांस कर रहे हैं जिनके नाम हम लेखकों को मालूम नहीं है। भाई, यह डांस का क्षेत्र जो हमारा नहीं है और इसमें इतनी वैरायटी है कि एक याद करो तो दूसरा भूल जाता है। हम जैसे लोग तो इन सब चीजों से दूर दूर तक वास्ता नहीं रखते। पर मेरे नायक मकरंद मिश्र साथ शुरू में ही बड़ी गड़बड़ हो गई। जब उनकी शादी हुई तो उनके ससुराल वाले डांस के शौकीन निकल गए जिनमें उनके सभी साले-सालियां हैं। सरहजों की तो आप बात ही मत पूछिए। वे सभी उन्हें पकड़ कर गाहे-बगाहे घसीट ही लेते हैं और उन्हें मजबूर हो कर डांस के नाम पर थोड़ा बहुत कूदना फांदना पड़ता है। वैसे सावधानी हेतु वे बारात की रोड लाइट से या डी जे से बहुत दूर रहते हैं फिर भी कभी कभार बुरी तरह फंस जाते हैं। बड़ी विकट समस्या है उनकी, यह अदना लेखक उसे हल नहीं कर पाता।
पता नहीं आपका क्या अनुभव क्या है इस मामले में, मिलने पर अवश्य बताइएगा। मेरे छात्र जीवन तक तो शादियों में डांस करने बहुत रिवाज नहीं था अतः कभी हमारी पीढ़ी को सीखने की आवश्यकता ही महसूस नहीं हुई। हमारे बाद की पीढ़ी जब अवतरित हुई उसके बाद समय बड़ी तेजी से बदला। बुफे डिनर होने लगे, डिजाइनर सूट और लहंगे आ गए, वीडियो कैसेट बनने लगे और शादी के पूर्व ही दूल्हा दुल्हन के बीच बातचीत होने लगीं। घर के दरवाजे से हम मैरिज हॉल में आ गए और शादियों का खर्च चौगुने से भी अधिक बढ़ गया। शादियों में द्वारपूजा के वक्त हाथी घोड़े आने बंद हो गए, तिलक के बदले लोग रिसेप्शन करने लगे और कन्या निरीक्षण के बदले प्रत्यक्ष जयमाला होने लगी। सास-ससुर, भाई-भतीजे, बुआ और भाभियां एक साथ डी जे पर डांस करने लगे। घूंघट हट गया और महिलाएं और पुरुषों के नए नए परिधान आ गए जिनके नाम भी हम सबको नहीं पता। इतना कुछ बदल गया कि पता ही नहीं चला कब हम आउटडेटेड हो गए? और वह भी सिर्फ एक वजह से, क्योंकि हमें डांस करना नहीं आता। शादी विवाह में बारात में नवयुवक जब ताल पर थिरकते हैं और उसमें हमें बुलाते हैं तो हम झेंप जाते हैं, इसलिए नहीं कि हमारा ज्ञान किसी से कम है, या किसी और मामले में हम किसी से कम है, पर यह कमबख्त डांस न कर पाना एक ऐसा अवगुण बन जाता है जिसका कोई तोड़ नहीं। हमारी कूद फांद को देखकर सभी हंस पड़ते हैं और हमारा फूफा या जीजा इत्यादि होने का सारा टेंपो धरा का धरा रह जाता है। इस तरह हमारा चांस पे डांस करने का मामला गड़बड़ हो जाता है।
कभी कभी तो मैं भी सोच में पड़ जाता हूं कि अपने बेटे की शादी में मेरा क्या हश्र होगा, कहीं उसमें तो नहीं कोई मुझसे आग्रह कर बैठेगा? आशंका देखकर मन में थोड़ी प्रैक्टिस कर लेने का भाव जगता है पर कहें किससे? पत्नी से अपना प्लान बताऊं तो गारंटी है कि वह अपने मायके में ढिंढोरा पीट देगी। स्त्री के पेट में कोई बात कहां छुपती है, यह तो आप जानते ही हैं। बाथरूम सिंगर्स की तरह डांस की प्रैक्टिस बाथरूम में नहीं की जा सकती जैसे गाने की प्रैक्टिस संभव हो जाती हैं। यहां मामला थोड़ा रिस्की है। कहीं गलती से भी अगर टाइल्स पर पैर फिसल गया तो लेने के देने पड़ जायेंगे, प्लास्टर चढ़ेगा सो अलग। इसलिए सोचता हूं, जब घर में कोई नहीं हो तो थोड़ा बहुत हाथ पांव मार लिया जाय और वह भी बहुत कम म्यूजिक पर कि पड़ोसियों को भनक न लगे, और पत्नी को तो बिल्कुल भी नहीं। सावधान रहना बहुत जरूरी है। मुझे अच्छी तरह याद है कि कभी कभार चांस पे डांस जैसा सीन मेरी गाड़ी में मेरे दो अभिन्न मित्रों द्वारा क्रिएट किया जाता था पर वह एक साधारण बात थी। यहां मामला अत्यधिक गंभीर है क्योंकि यह मेरे मित्र मकरंद मिश्र की प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ है। मेरे अन्य मित्र भी ऐसा ही कुछ झेलते होंगे क्योंकि कई बार गाड़ी की पिछली सीट पर प्रैक्टिस करने के बावजूद यह तो तय है कि हम में से कोई भी इस कला में पारंगत नहीं हो पाया था।
मकरंद मिश्र ने तो कई बार तो शादियों में पैर में मोच या कमरदर्द का बहाना बनाया पर अंततः पोल खुल गई क्योंकि जैसे ही उनके साले सरहज थोड़े किनारे हुए वह यह भूल गए कि उन्हें मोच होने की एक्टिंग करनी है। सीधे आदमी जो ठहरे। चाल समझ में आते ही वे उन्हें टांग ले गए और डी जे पर खड़ा कर दिया और फिर क्या हुआ, आप समझ ही गए होंगे। उनसे छोटे साले तो कुछ नहीं बोलते पर जो बड़े हैं, बड़े जालिम हैं, उन पर पर जरा भी नरमी नहीं दिखाते। लौटकर वह जब अपना दुखड़ा मुझे सुनाते हैं तो मुझे उनका कष्ट जानकर बड़ा दुख होता है और मैं उन्हें समझाने का यत्न करता हूं। पर अगली बार के लिए हम दोनों मिलकर कुछ सोच रहे हैं। आप अपने आदमी हैं इसलिए बता रहा हूं, किसी से कहिएगा मत। हम डांस सीख कर अपने को अपग्रेड कर रहे हैं। क्या विडंबना है, अपने को अपग्रेड भी छुप छुपा कर करना पड़ रहा है।
वे जब भी मिलते हैं अपना दृढ़ निश्चय दोहराते हैं और मैं उन्हें समर्थन देता हूं। कुछ ही दिनों में उनके छोटे साले की शादी है अतः तैयारी जोर शोर से चल रही है और प्रैक्टिस का उन्हें भरपूर मौका भी मिल रहा है। उनकी पत्नी आजकल छोट भाई की शादी की खरीदारी में व्यस्त हैं और अक्सर घर खाली रहता है। वे प्रसन्न हैं, अबकी बार ससुराल वालों को चित जो कर देना है। वे भी क्या याद करेंगे कि यह मकरंद मिश्र क्या चीज है। उन्हें यह भी पता चलेगा कि उनका जीजा किसी मामले में कम नहीं। दिन जल्दी गुजर रहे हैं और मेरे मित्र के चेहरे की मुस्कान बता रही है कि वे डांस के नए नए पायदान चढ़ते चले जा रहे हैं। पर मेरी स्थिति कुछ अलग है क्योंकि लेखन और बाजार आने जाने के बाद समय ही कहां बचता है, और जो थोड़ा बहुत होता भी है तो पत्नी घर पर मौजूद होती है इसलिए मैं मकरंद मिश्र में ही अपने आप को देखता हूं और उनके सफल होने की दुआ करता हूं। आखिर मुझे भी मेरे ससुराल वालों ने कम परेशान थोड़े किया है? वे ससुराल वालों द्वारा सताए हुए लोगों के नेता बनकर उभरे हैं जो लड़ेगा और जीतेगा भी। हमें उनपर पूरा भरोसा है।
उनके साले की शादी नजदीक आ गई है। तिलक कल ही है। डी जे लग रहा है और मकरंद मिश्र दूर से ही युद्धभूमि का निरीक्षण कर रहे हैं। समय नजदीक आते ही उनकी भुजाएं फड़कने लग रही हैं और जैसे वह बस बिगुल बजने का इंतजार कर रहे हैं, परफॉर्म करने के लिए उतावले। आजकल वे अपनी पत्नी और सालों से कम बोलते हैं, इस भय से कि कहीं खुद ही राजफ़ाश न कर दें। पत्नी भी थोड़ी सशंकित है, कुछ तो अवश्य बदला है जो उन्हें नहीं पता, पर सोचती हैं, शायद उम्र का तकाज़ा है इसलिए ऐसे हो गए हैं। शाम होते ही डी जे बज उठा है, बच्चे उछल कूद रहे हैं। तिलक के बाद वह घड़ी आती है जिसका मकरंद मिश्र को महीनों से इंतजार था। उनकी पत्नी उन्हें बुलाती हैं कि शायद इससे उनके चेहरे की गंभीरता कुछ कम हो। वो मना कर देते हैं। पर जैसे ही उनके साले डांस करना शुरू करते हैं मकरंद मिश्र लगभग दौड़ते हुए वहां पहुंचते हैं और गाना लगाने वाले से उनका गाना बजाने की फरमाइश कर देते हैं। सभी आश्चर्यचकित हैं कि यह उनके जीजा का कौन सा रूप आज उन्हें देखने को मिल रहा है। पर यहां भी एक गड़बड़ हो चुकी है, जिस गाने पर मेरे मित्र ने महीनों अभ्यास किया वह गाने वाले के पास है ही नहीं। मैं कुछ दूर खड़ा सब देख रहा हूं कि वे उसे बार बार डांट रहे हैं। वह उनसे कह रहा है, “सर, अब ऐसे गानों पर कौन डांस करता है, मेरे पास नहीं है, आपको ले कर आना चाहिए था”। इसी तकरार के बीच बज उठता है, “बुलेट पर जीजा, बुलेट पर जीजा”, वही गाना जिसके लिए मकरंद मिश्र बिल्कुल तैयार नहीं थे। मैं देख रहा हूं कि उन्हें डी जे के केंद्र में खींचा जा चुका है और उन्हें जैसे तैसे अपनी परफॉर्मेंस दिखानी पड़ रही है। गाने लगातार बदल रहे हैं, कभी “लगवेलु तू जब लिपीस्टिक” तो कभी कोई और, उन सभी में हमारा नायक एक बार पुनः परस्त एवं आउटडेटेड सिद्ध होता है। इस तरह उनका डांस पे चांस का मामला एक बार पुनः व्यर्थ होता है। जब वे हांफते हुए बाहर आते हैं तो उनकी भाव भंगिमा देखकर मुझे थॉमस हार्डी के नायक माइकल हेन्चार्ड की बहुत याद आती है जिसे फेट और चांस ने हरा दिया था। काश उस गाने वाले के संग्रह में वह गाना होता तो स्थिति एकदम उलट होती। सांत्वना देने हेतु मैं मिर्जा अज़ीम बेग का यह शेर पढ़ता हूं:
गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में
वो तिफ्ल क्या गिरें जो घुटनो के बल चलें।
यह बाद में पता चलता है कि उन्होंने गुलाम अली की किसी ग़ज़ल पर प्रैक्टिस की थी। तब मैं अपना माथा पकड़ लेता हूं और मुझे यह आभास होता है कि वास्तव में हमलोग कुछ ज्यादा ही आउटडेटेड हैं जिसकी भरपाई इस जन्म में संभव नहीं।