कविता जा रही हैपुस्तकें भी जा रही हैंतुमको हो गई आदतअब मसाले की। संस्कृति भी जा रही हैधर्म भी जा रहे हैंफिक्र किसको हैअब रीति-रिवाजों की? गीत की सांस टूटीकथाकारी तिरस्कृत हैतुमको हो गई है आजचिंता बस निवाले की। लोक भाषाएं हमारीगुड़ की चाशनी सीतुमको हो गई आदतअलग सा गुनगुनाने की। रचना सिमटकर पुस्तकों मेंचंद सांसे गिन रही हैतुमको हो गई आदतनजरें चुराने की। सभ्यताएं मिट गई कितनीइसी तरह, धीरे धीरेतुमको...
ये बहुत बड़ी बात है
जहां बगीचे थे, वहां रेगिस्तान हो गएघरों के आसपास कूड़ेदान हो गएतलो-तालाब सूखकर अनजान हो गएखेत खलिहान अब दुकान हो गए। घर घर न रहे, ऊंचे मचान हो गएलिहाज और शर्म बदनाम हो गएमंदिर, जो कभी थोड़ा सुकून देते थेसिमटकर अब गुमनाम हो गए। कोई रहे कहां और जाए कहां आजदरो दीवार सारे इश्तिहार हो गएदुनिया इतनी बदली कब, पता नहीं मुझेदिल के शीशे टूट कर गाहे गराज हो गए। खुली हवा का एक झोंका दूभर हुआ जहांअब कैमरे हैं...
रौशनी
जहां तक रौशनी नहीं जातीवहां भी मेरी गजल जाएहौसले मेरे कम नहीं होगेभले ताउम्र यह सफर जाए। रोज ही एक नए फसाने काअजीब शौक है तुझकोलिख दूं मैं तुझ पर शेर कोईतेरा नकाब ही उतर जाए। चलो कुछ आग छुपी रहने दूंइश्क भी, रंज भी अपनाकुछ दिनों बाद देखेंगेकहां क्या-क्या लिखा जाए? मैं बहुत दूर निकल आयाजैसा उसने मुझसे चाहा थाअब तो पिछला मरहला मुझकोज़रा ज़रा सा ही बसर आए। अब कलम है, चंद गजलें हैंमैं ही उस्ताद हूं...
संसार
यह प्यारा मधुमय सा संसारप्रात खोले है मन का द्वारदिवस भर खुशियों का अंबाररात को तारों में घर बार। क्षितिज जब उगता है सोनानींद छोड़े हैं हर कोनाकूकते कलरव करते खगकिरण से जगमग होता जग। फूल खिल उठते हैं सारेअंगड़ाई लेती हैं कलियांखुशबू फैल रही हर ओरजहां मदमस्त हो गए मोर। सुबह की भीगी यह खुशबूबुलाती मुझको अपने पासपुष्प पर भ्रमरो की अनुगूंजलगता है आया ज्यों मधुमास। फैलती महुए की चादरटपा टप पेड़ों के...
मुकाम
बहता रहा सदा ही नदी की धार में जैसेकुछ हाथ में था ही नहीं पतवार के जैसे। करता रहा सफर एक अनजानी डगर परजिस राह पर कोई न निकला था बसर पर। तिनका हूं मेरे हाथ में कुछ भी तो नहीं हैनजरों में दूर दूर तक कोई भी नही है। बस मान लिया मैने कि तू साथ खड़ा हैतबसे मेरा अंदाजे-बयां सबसे जुदा है। मालूम नहीं पंक्तियां ये कौन लिख रहाचुपचाप खड़ा देखता कागज़ सिमट रहा। कोई गज़ल भी मुझमें है सोचा ही नहीं थाएक गीत कभी...
कोशिशें हमारी हैं
कोशिशें हमारी हैं, फैसला तुम्हारा हैकुछ तो सोच कर तुमने, हमें यहां उतारा है। जिंदगी है छोटी सी, चार दिन का डेरा हैजो भी दे दिया तुमने, कर लिया गुजारा है। सुख औ दुख के साए में, वक्त यूं फिसलता हैमुस्कान ज्यों ही खिलती है, दर्द आ के मिलता है। कुछ भी ना हुआ हासिल, मुझको सुख़न-साज़ी मेंबस इंतजार है तेरा, इतनी ही तो बाजी है। वह समय भी देखेंगे, जब कभी तुम आओगेअपनी आरजूओं से हम तुमको आजमाएंगे। हमने कैसा...
संक्रांति काल
हम मानव संक्रांति काल केमूल्यों के अवसान काल केनए पुराने दो पाटों मेंसामंजन बैठाया करतेसंबंधों की डोर न टूटेखुद का जी बहलाया करतेहमने है पितरों से सीखाऊंचाई पर गर्व न करनाअपनेपन के आलिंगन मेंसब को लेकर साथ है चलना। अर्जन की कमी खलती हैमन में कोई कमी ना आईअपना खो कर सबको पायामन में लेकिन क्लेश ना आयानैतिकता का मोल बड़ा हैसोच में कोई आंच न आईआज इस संक्रांति काल मेंजीवन मूल्यों का मोल नहीं है। कोई...
मिल्कियत
कितने बदल गए हम भीप्यास ही जिंदगी कर लीमौसम से रंज कर बैठेऔर फूलों से दोस्ती कर ली। क्या मिला, न मिला, देखे कौन?कौन इतना हिसाब कर डालेहै फुर्सत किसे जो वणिकों साअपना मिज़ाज कर डाले? जफ़ा वाले सोच में रहतेकि पत्थर का जवाब पत्थर हैमैंने रिवायत पलट कर रख डालीफूलों में जवाब कर डाला। लगा लो मिल्कियत का हिसाबमैंने पलड़े ग़ज़ल को रख डालातुम जो चाहो तुम रख डालोमैंने अपनी शग़ल को रख डाला। अब देखें कहां ले...
मधुशाला
रातें कट गई गजलों में मेरीगीतों में दिवस बीत गएतेरी यादों में खो गया जबसेआज कितने बरस बीत गए। छेड़ दिया मन का तार फिरउस राग की तरन्नुम नेतेरी तलाश में फिरते हुएखुशबू के शहर रीत गए। तेरा साथ, रंगीली शामफिर लौटकर न आएगीकोशिशें लाख हों भुलाने कीदिल से अब याद कहां जाएगी? तुम मुझे सोचते होगेकिसी अनजान से शहर मेंमैं कविता में ढूंढता तुमकोतू मेरी मधु है, मधुशाला भी। जो फूलों और कलियों मेंखुशी का रंग...
इंतजाम
शक-ओ-शुबहा पनप रहे हो जहांवहां जाने का दिल नहीं करताहोश की मिल्कियत को अबदिल लगाने का जी नहीं करता। कोई भी बच नहीं सकताइस माहौल की मक्कारी सेजहां पर सच के दावेदारों मेंतरफदारी हद से ज्यादा है। अब चेहरे साफ नहीं दिखतेजो कभी आईने से लगते थेआज हक के तलबगारो मेंनाउम्मीदी हद से ज्यादा है। साहिबे-दरबार अब हम परकुछ मेहरबान हद से ज्यादा हैमेरा कलाम मुझसे कहता हैयहां अंधेरा हद से ज्यादा है। जो भी हो अंजाम...