चल चलीं गांव की ओरिया…कि मन भरल रहत शहरियारहत शहरिया हो, करत नोकरियाकि मन भरल रहत शहरिया…कि चल चलीं गांव की ओरिया। जहवां पर बीतल हो बचपन के दिनवांजहवां पर लागेला सावन में झुलनवांजहवां पर तोहर घर दुआर हो…कि चल चलीं गांव की ओरिया। नौकरी पर मेठ लोग रोज धमकावेपाई पाई जोरि सब चऊका चलावेमहंग भईल दुई जून रोटिया…कि चल चलीं गांव की ओरिया। राहि देखत सूखि गइलें अखियां के पनियांमाई बाप याद करें तोहर...
फिर खिलेंगे फूल प्रियतम
फिर खिलेंगे फूल प्रियतमफिर से होगी भोरआस की किरण जगेंगीमधुमास में चहूं ओर। रातरानी फिर करेगीनींद से मुंहजोरमोगरे पर फिर से होंगेभ्रमर, रस के चोर। सुख-दुख लिखे हैं नियति मेंज्यों दिवस में अवसानरात का होना निरंतरहै सुबह का सम्मान। सुख परखता आदमी केकर्म को, संज्ञान कोदुख परखता आत्मबल कोतेज को, अभिमान को। क्या मनुज जो रो रहा हैअल्प से ठहराव मेंक्या मनुज जो दुखी होकरडूबता अवसाद में। क्या हुआ जो आज...
मान मेरा है यह वतन मेरा
मैं रहूं ना रहूं वतन मेरातू रहेगा यही जतन मेराव्यर्थ ही आंधियों से डरते होअमिट एहसास है वतन मेरा। माना हम आज कुछ परेशां हैआज आंखों में कुछ नमी सी हैकल तो अपना है यह गुमाना हैअनगिनत दौरे ऐसे गुजरे हैंऔर निखरा है यह वतन मेरा। मुश्किलों में ही परख होती हैकौन कब तलक हमकदम होगाजब भी कुछ बेबसी का मंजर होफिर से उभरा है यह वतन मेरामान मेरा है यह वतन मेरा। कौन कहता है चांद चलता हैकौन कहता है गुलों में रंग...
दीपक
वह दीपक मुझे बुलाता हैविकराल तिमिर के बिंब बीचमुझको लड़ना सिखलाता हैवह मुझमें आस जगाता हैवह दीपक मुझे बुलाता है। कैसे एक जरा सी लौलड़ती घनघोर अंधेरे से?दृढ़ निश्चय की बाती परअपने कदम टिकाता हैवह दीपक मुझे बुलाता है। मुझमें है उसका अंश कोईमेरा उससे संबंध कोईजब स्वप्नों का हो अनस्तित्ववह मुझमें स्वप्न जगाता हैवह दीपक मुझे बुलाता है। निश्चित है लड़ना होगा हीजब भी कोई निःशब्द हुआकोई बेड़ी में जकड़ा...