मैं कवि हूं सिर न झुकाऊंगामैं झूठा यश न कमाऊंगाजो देख रहा हूं आंखों सेकविता में लिखता जाऊंगामैं कवि हूं सिर न झुकाऊंगा। लेखन ही सत्कर्म मेरादर्पण बनना है धर्म मेराभले कोई मुझसे विलग रहेनिर्बल का साथ निभाऊंगामैं कवि हूं सिर न झुकाऊंगा। अपनी कोई अभिलाष नहींहै मन में कोई त्रास नहींएक देह मिली, एक देश मिलाजिसकी पीड़ा मैं गाऊंगामैं कवि हूं सिर न झुकाऊंगा। किस तरह छोड़ दूं अपनों कोशोषण के अंधियारे...
ओ प्रियतमा
आओ मेरे पास आओ प्रियतमाअपनी खुशबू से मिलाओ प्रियतमाजानता मनुज मैं बेकार सा मैं हूंतुम मुझे चंदन बनाओ प्रियतमा। यूं तो फूलों पर बहुत से रंग आएभ्रमर के गीत भी कलियों को भाएजो फागुन के रंगो में होता सम्मिश्रणतुम वही मुझको लगाओ प्रियतमा। मैं वक्त को गजलें सुनाता रह गयातेरे रूप को भी ठीक से देखा नहींआज जागी मेरे मन की हररितिमातुम जिंदगी मेरी सजाओ प्रियतमा। संसार में मुझसा अनूठा कौन हैतुम जो पारस से...
मधुशाला
रातें कट गई गजलों में मेरीगीतों में दिवस बीत गएतेरी यादों में खो गया जबसेआज कितने बरस बीत गए। छेड़ दिया मन का तार फिरउस राग की तरन्नुम नेतेरी तलाश में फिरते हुएखुशबू के शहर रीत गए। तेरा साथ, रंगीली शामफिर लौटकर न आएगीकोशिशें लाख हों भुलाने कीदिल से अब याद कहां जाएगी? तुम मुझे सोचते होगेकिसी अनजान से शहर मेंमैं कविता में ढूंढता तुमकोतू मेरी मधु है, मधुशाला भी। जो फूलों और कलियों मेंखुशी का रंग...
पथिक
उठो भूमि पर पड़े पथिक तुमआगे बढ़ने के मतवालेबस कदमों के थक जाने सेराही नहीं रुका करते हैं। चलो क्षितिज की और चलेंआंधी का रुख मोड़ चलेंतूफानों के आ जाने परलक्ष्य नहीं बदला करते हैं। बस साधन है थकन तुम्हारीदृष्टि साध्य पर तानो फिर सेमन से हारे नहीं अगर होकौन तुम्हे हारा कहते हैं? जीवनलीला यह क्षणभंगुरदो पल का ही मेला साराकुछ फूलों के मुरझाने परउपवन कहां कभी रोते हैं? भले बिजलियां टूट पड़ेंघिर आएं...
मुस्कान
राह पर प्रस्थान फिर फिरमार्ग का अनुमान फिर फिरधूप हो या छांव फिर फिरगेह का निर्माण फिर फिर। कर नमन इन बाजुओं कास्वेद का कर दान फिर फिरकर्म पथ पर फिर भरोसाप्रारंभ हो श्रमदान फिर फिर। बस यही तो जिंदगी हैप्राप्ति का अरमान फिर फिरलक्ष्य पर संधान फिर फिरप्रेम का सम्मान फिर फिर। गर्दिशों की शाम जो होसुन ग़ज़ल की तान फिर फिरमरू हो या गुलशन कोई होनीड़ का निर्माण फिर फिर। ले मधु का जाम फिर फिरकर खुशी का...
नई रेख रच देंगे
मैं तुम्हे पुष्प बुलाऊं, तुम कहो भ्रमर मुझकोये वही बात पुरानी, इसमें कुछ नया क्या है? तुम बनो सागर मेरे, मैं नदी बहती बेकलये वही बात पुरानी, इसमे कुछ नया क्या है? समय की लहर में यूं बह गए मानक अपनेफूल पर धूल जमी है, नदी रेत से पट चुकी कब की। सागर को इंतजार है लंबा…नदी से मिलने का!कवि गरीब सा उपमान खोजता फिरता। कोयल की कूक कहां, मैना की डाल खाली हैमहुए की महक कहां, न सरसों की चूनर धानी। वे कहते...
अग्निपथ
अग्निपथ पर अटल रह हुंकार करजो भी आए सामने स्वीकार करकोई आग्रह या किसी याचना क्यामहाभारत सज गया है युद्ध कर। बहुत तुमने संस्कृति का भान रखाबहुत तुमने बंधुता का मान रखादूत भेजा शांति का प्रस्ताव रखाशत्रु पर अब अस्त्र का संधान कर। शिविर में विश्राम अब तू त्याग देवीर है तू युद्ध पर अब ध्यान देछोड़ कर निज हानि की चिंता सदालक्ष्य को अब ध्यान में अपने लगा। भूल जा संग्राम के परिणाम कोयाद तू अपने कुल के...
हिन्दी
मैं हिन्दी हूं, मैं हिन्दी हूंमैं भारत मां की बिंदी हूंजो सदा सुशोभित वसुधा परमैं शब्दों की कालिंदी हूं।
है ओज रहा परिचय मेराहै जोश सदा सहचर मेरामैं जिह्वा की आनंदी हूंमैं हिन्दी हूं, मैं हिन्दी हूं।
मैं भावों का सुंदर संयोजनभारत का ऊर्जित संबोधनसंस्कृतियों की मैं संधि हूंमैं हिन्दी हूं, मैं हिन्दी हूं।
जब चलते चलते रात हुई
जब चलते-चलते रात हुईइन छालों से कुछ बात हुईमंजिल का था पता नहींकुछ आंखों से बरसात हुईथक कर बैठा था मनुज मौनजुगनू बोला रोता है कौन?छोड़ो तुम सारी चिंताएंबीता जो कल की बात हुईआंसू क्यों व्यर्थ बहाते होबाधाओं से घबराते हो? आओ मैं तेरी थकन हरूंअपने मन कि बात कहूंरातों के घने अंधेरे मेंजब जलता कोई दीप नहींपदचिन्हों की हर रेख मौनकिससे पूछेगा राह कौन?जब तारों पर छाते बादलतूफान हो गया हो पागलतब भी आशाएं...
फिर खिलेंगे फूल प्रियतम
फिर खिलेंगे फूल प्रियतमफिर से होगी भोरआस की किरण जगेंगीमधुमास में चहूं ओर। रातरानी फिर करेगीनींद से मुंहजोरमोगरे पर फिर से होंगेभ्रमर, रस के चोर। सुख-दुख लिखे हैं नियति मेंज्यों दिवस में अवसानरात का होना निरंतरहै सुबह का सम्मान। सुख परखता आदमी केकर्म को, संज्ञान कोदुख परखता आत्मबल कोतेज को, अभिमान को। क्या मनुज जो रो रहा हैअल्प से ठहराव मेंक्या मनुज जो दुखी होकरडूबता अवसाद में। क्या हुआ जो आज...