Categoryमेरी कविताएं

मधुशाला

रातें कट गई गजलों में मेरीगीतों में दिवस बीत गएतेरी यादों में खो गया जबसेआज कितने बरस बीत गए। छेड़ दिया मन का तार फिरउस राग की तरन्नुम नेतेरी तलाश में फिरते हुएखुशबू के शहर रीत गए। तेरा साथ, रंगीली शामफिर लौटकर न आएगीकोशिशें लाख हों भुलाने कीदिल से अब याद कहां जाएगी? तुम मुझे सोचते होगेकिसी अनजान से शहर मेंमैं कविता में ढूंढता तुमकोतू मेरी मधु है, मधुशाला भी। जो फूलों और कलियों मेंखुशी का रंग...

फूल

खिलाओ बंजर में फूल तुम भीयह वक्त हरदम मिला नहीं है। मिलाओ खतरों से आज नजरेंयह पल भी अक्सर दिखा नहीं है। जो काम करता वह आदमी हैयह आराम का मामला नहीं है। जो पर्वतों पर बनाता राहेंआसानी से तो चढ़ा नहीं है। गहरे पानी में रत्न मिलतेऔर कोई फलसफा नहीं है। तेरा पसीना ही बनेगा मोतीवह अभी तक गुनगुना नहीं है। बढ़ाओ हाथों का जोर फिर सेअभी तुममें वह सिरफिरा नहीं है। समय कहां है कि उदास बैठोसमय तो पीछे गया...

सफर

जिंदगी के सफर में कोई रात दिनकाम करता रहा कोई सोता रहामंजिलों ने स्वयं चुन लिया रास्ताकोई पाता रहा कोई खोता रहा। सदा प्यास चलकर कुएँ तक गईसदा कोशिशें बन गई रोशनीसदा कर्म को ही मिली मंजिलेकोई जगता रहा कोई सोता रहा। जो सदा कंटको से उलझता रहावह इबारत नई एक लिखता रहासफर की थकन जिसने माना नहींवह सदा ही शिखर पर पहुंचता रहा। आशा निराशा के सोपान कितनेयूं आकर मनुज को तराशा करेंजिंदगी को निभाना बड़ी बात...

मुस्कान

राह पर प्रस्थान फिर फिरमार्ग का अनुमान फिर फिरधूप हो या छांव फिर फिरगेह का निर्माण फिर फिर। कर नमन इन बाजुओं कास्वेद का कर दान फिर फिरकर्म पथ पर फिर भरोसाप्रारंभ हो श्रमदान फिर फिर। बस यही तो जिंदगी हैप्राप्ति का अरमान फिर फिरलक्ष्य पर संधान फिर फिरप्रेम का सम्मान फिर फिर। गर्दिशों की शाम जो होसुन ग़ज़ल की तान फिर फिरमरू हो या गुलशन कोई होनीड़ का निर्माण फिर फिर। ले मधु का जाम फिर फिरकर खुशी का...

उम्मीद

तुमसे मिलने की उम्मीद करता रहूंसाथ चलने की उम्मीद करता रहूंलोग कहते हैं तुम अब समझने लगेमन के मिलने की उम्मीद करता रहूं। अब तलक तो रही दूरियां दरमियांशायद मुझसे बड़ी हैं वे मजबूरियांतुम बंधन कभी भी छुड़ा ना सकेतुम दिलासे भी मुझको दिलाना सके यूं तो आए कई पल मुलाकात केबंद खुल ना सके अपने जज्बात केहै किया फैसला की कह देंगे हममन में जो भी छुपे हैं कमल भाव के। तुम जो चाहो तो कुछ मशवरे तुमको दूंरोज...

हर पल को ग़ज़ल कर दूं

यह बहुत है, तुम साथ हो मेरेजीवन में मिठास छलक आई हैवरना घर में बैठकर तन्हाहर पल का वजन गिनता। तुम दिन के हो उजालेरातों की महक तुम होहोठों पर मुस्कुराहट कीबस एक वजह तुम हो। कैसे यह समय बीतामालूम नहीं मुझकोअभी तो हम चले थेदो चार कदम मिलकर। अभी तो इश्क सीखा हैमजलिस के माहिरों सेबाकी है आजमानाकितने ही मशवरों को। अभी तो फलसफे भीसमझ में नहीं आएबस इतना जानता हूंतुम हो तो जिंदगी है। वक्त को थाम लूं...

ये उलझनों के साए

ये उलझनों के साए जब भी हैं मन पे छाएहैं मुश्किलें सिखातीं कि कैसे कदम बढ़ाएं? अंधेरी सी उस डगर पर हो कोई न साथ तेरेफिर भी है राह मुमकिन जगनुओं ने हैं बताए। डरना नहीं कभी तुम अनजाने रास्तों परबस हिम्मतों ने कितने सफर खुशनुमा बनाए। चलना तो होगा सबको हो वसंत या मरू होपर जीतता वही है जो स्वेद में नहाए। बंजर सी रेत पर मैं ये गज़ल लिख रहा हूंहंसकर जो मुझसे कहती आ तुझको आजमाएं? एक शेर मेरा रख लो इस राह...

कादंबरी

इन ऊंचे नीचे रास्तों मेंमंजिलों के वास्तों मेंकोई प्रियतम आन मिलताकोई प्रिय सहसा बिछड़ता। कभी उत्थान का आनंद हैकभी गर्दिशों की शाम हैचलते ही जाना जिंदगी हैपल भर नहीं विश्राम है? मार्ग का आकर्ष सबकोऔर आगे खींचता हैक्षितिज का हर बिंब नूतनकदमों को मेरे तौलता है। हर नदी श्वेतांबरा सीअपनी गति से दर्श देतीएक ताजगी सी जागती हैजब भी कोई पवन चलती। कंटको का क्या भरोसाकब पगों को बेध देंगेखाईयों का क्या...

अरदास

समय के वेग में यूं बढ़ गए कदमयाद ही ना रहा प्रेम कहना है कबतुम सामने से कुछ यूं ओझल हुएहोश ही ना रहा संजोना है कब? वश में था ही नहीं थाम लें वक्त कोमांग लें, गढ़ ही लें मुकद्दर नयारोक लें हम तुम्हें भर के आगोश मेंथा पता ही नहीं दूर होना है क्या? ओस का ओज ज्यो घास में बुझ गयाजैसे थम सा गया समंदर कोईफूल की डाल से पुष्प जैसे गिरेटूट गिरता है ज्यों तेज तारा कोई। ठीक वैसे गए तुम मुझे छोड़ करयह लगा ही...

मौसम

पिछला मौसम बीत गयाथा वह कितना अपना साबस कुछ डालों पर फूल न थेपर था वह कितना सपना सा। पिछले मौसम में हमने कितनेकलियों पर अपना दिल हारापिछला मौसम ही मौसम थाभंवरे रस पीकर मदमस्त हुए। पिछले मौसम में हमने तेरेबालों को बदली मान लियापिछला मौसम में ही तुमनेकजरारे अपने नैन किए। पिछले मौसम में कोयल नेअपने मन की बात कहीमधु के गुच्छे डालो पर लटकेअमिया से अनुबंध हुए। पिछले मौसम में हमनेगीतों में सब कुछ लिख...

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Prof. Vachaspati Dwivedi teaches English in Sant Vinoba P.G. College, Deoria, U.P. India. He is a PhD from India's reknowned University BHU, Varanasi with a first class Post-graduate degree. His foreign tenures took him to teach in Haramaya University, Ethiopia and Al Fateh University Tripoli, Libya. He has 8 books to his credit and more than 30 papers published in different journals, both national and international. In 2012 he presented a paper on Folk Literature in Bangkok International Conference , Thailand and in Feb 2019 he went to Singapore to present a paper on Hijra Autobiographies. He edits an international online journal 'Critical Paradigm' which can be accessed at www.criticalparadigmjournal.com.
He is an acclaimed poet of Hindi as well and has published three poetry collections namely 'Ret ke Sahar Me', 'Phir Khilenge Fool Priytam' and 'Jindagi Jo Shayari Hoti'. Recently his story collection 'Apna Apna Moksh' (2024) has been published worldwide and is available on Amazon and Flipkart.