यह प्यारा मधुमय सा संसारप्रात खोले है मन का द्वारदिवस भर खुशियों का अंबाररात को तारों में घर बार। क्षितिज जब उगता है सोनानींद छोड़े हैं हर कोनाकूकते कलरव करते खगकिरण से जगमग होता जग। फूल खिल उठते हैं सारेअंगड़ाई लेती हैं कलियांखुशबू फैल रही हर ओरजहां मदमस्त हो गए मोर। सुबह की भीगी यह खुशबूबुलाती मुझको अपने पासपुष्प पर भ्रमरो की अनुगूंजलगता है आया ज्यों मधुमास। फैलती महुए की चादरटपा टप पेड़ों के...
मुकाम
बहता रहा सदा ही नदी की धार में जैसेकुछ हाथ में था ही नहीं पतवार के जैसे। करता रहा सफर एक अनजानी डगर परजिस राह पर कोई न निकला था बसर पर। तिनका हूं मेरे हाथ में कुछ भी तो नहीं हैनजरों में दूर दूर तक कोई भी नही है। बस मान लिया मैने कि तू साथ खड़ा हैतबसे मेरा अंदाजे-बयां सबसे जुदा है। मालूम नहीं पंक्तियां ये कौन लिख रहाचुपचाप खड़ा देखता कागज़ सिमट रहा। कोई गज़ल भी मुझमें है सोचा ही नहीं थाएक गीत कभी...
कोशिशें हमारी हैं
कोशिशें हमारी हैं, फैसला तुम्हारा हैकुछ तो सोच कर तुमने, हमें यहां उतारा है। जिंदगी है छोटी सी, चार दिन का डेरा हैजो भी दे दिया तुमने, कर लिया गुजारा है। सुख औ दुख के साए में, वक्त यूं फिसलता हैमुस्कान ज्यों ही खिलती है, दर्द आ के मिलता है। कुछ भी ना हुआ हासिल, मुझको सुख़न-साज़ी मेंबस इंतजार है तेरा, इतनी ही तो बाजी है। वह समय भी देखेंगे, जब कभी तुम आओगेअपनी आरजूओं से हम तुमको आजमाएंगे। हमने कैसा...
संक्रांति काल
हम मानव संक्रांति काल केमूल्यों के अवसान काल केनए पुराने दो पाटों मेंसामंजन बैठाया करतेसंबंधों की डोर न टूटेखुद का जी बहलाया करतेहमने है पितरों से सीखाऊंचाई पर गर्व न करनाअपनेपन के आलिंगन मेंसब को लेकर साथ है चलना। अर्जन की कमी खलती हैमन में कोई कमी ना आईअपना खो कर सबको पायामन में लेकिन क्लेश ना आयानैतिकता का मोल बड़ा हैसोच में कोई आंच न आईआज इस संक्रांति काल मेंजीवन मूल्यों का मोल नहीं है। कोई...
ओस
ओस की एक बूंदगिरी घास परकोने पर अटकीथोड़ी सी ठिठकी। फिर बोली मुझसेतू क्या देखे मोयपल ही जीवन मेरासाथ न आया कोय। फिर भी मैं हंसती हूंहीरे सी चमकती हूंसतरंगी रंग लिएकिरणों का संग लिए। एक ठंडा शीतल साकोमल एहसास मेराजैसे कोई सपना होपल भर इतिहास मेरा। यह दूब हरित चादरछोटा आकाश मेरासूरज के चमकते हीपानी बन जाऊंगी। तुम आए धरती परएक लंबी उम्र लिएफिर भी हो संशय मेंहै क्या प्रारब्ध तेरा? जीवन तेरा...
यायावरी
बीत गई रात रीआ गई यायावरीआज यहां कल वहांफक्कड़ों का राज री।
जिंदगी में आ गईअलग सी एक रास रीबंधनों से मुक्त जैसेहो रही मन की लड़ी।
ह्रदय में उल्लास जैसेवसंत का हो राग रीलेखनी भी मस्त होकरलिख रही जिंदादिली।
समय में बदलाव कीछा गई है ताजगीआज जाना मैंने खुद कोरोज ही नव गान री।
मरासिम
जिंदगी सरपट गुजरती जा रही हैजैसे कोई हो रेलगाड़ीआ भी रहे हैं लोगजा भी रहे हैं लोगहर आदमी अपने मरासिम जी रहा है।
सभी जल्दी में कितने आजकल हैं?रिश्ते भी दूरभाषी हो गए हैंइच्छाएं स्वप्न में अब ढल रहीं हैंदूरियां तो मिट गईं भूगोल कीपर उम्मीदें कितनी खाली हो गईं हैं।
सुबह से शाम तक हम राह तकतेकहीं मुस्कान में छल हैकहीं पहचान दुर्बल हैएक दूसरे से अब किनारा हो गया हैआदमी टूट कर कितना बेचारा हो गया है।
शब्द ही मिले नहीं
न जाने कितने भावों कोकभी शब्द ही मिले नहींन जाने कितने गीतों कोकभी राग ही मिले नहीं। उमड़ कर बदलियां कितनीबरसी नहीं मरू में भीन जाने कितने फूलों कोदेखा नहीं किसी ने भी। क्या हिसाब तारों काजो टूट कर बिखर गएक्या हिसाब आहों कामिला कोई भी सिला नहीं। भ्रमर भी घूम कर लौटेकभी रस बिना ही उपवन सेकितने ही मृग दिशा खोकरसमूह से बिछड़ गए। न जाने कितने साधक कोसाध्य ही मिला नहींजो सदा व्याप्त घट घट मेंपास ही...
सुधर जाइए
अभी भी समय है सुधर जाइएबहुत लंबा सफर है सुधर जाइए।
देख लो लालिमा पूर्व में दिख रहीजल्द होता सहर है सुधर जाइए।
आंधियां कब रही किसी कैद मेंरात अंतिम पहर है सुधर जाइए।
नफरत की खेती बुरी चीज हैबीत जाए न खुद पर सुधर जाइए।
यह माना नशे में है ताकत बहुतपर जल्दी उतरता सुधर जाइए।
जाने कितने घरौंदे यूं ही टूटतेदर्द देता कहर है सुधर जाइए।
तल्ख़ियां कब तलक गूंजती रह गईउसकी सब पर नजर है सुधर जाइए।
सब चले गए
सब चले गएजितने थे…नेह के, स्पर्श केताप के, संघर्ष केप्रतिबिंब चले गए। वो छोटा सा घरौंदाक्षिति परमिट्टी का चूल्हाकुछ सोंधा सोंधा साखदर कर बह गया जोबारिश के थपेडों में कभी का। वो मां की हथेली और आंचलजो हमे था सिक्त करतावो दादी, खुद कहानी बन गईंलोरी सुना करपोते के सिर पर फिर रहे वो हाथबाबा के, कुछ खुरदरे सेउंगलियां जो सिंक गईं होरहा लगातेबाप के कंधे, कराते जो सवारीपीढियों का एक होना परस्परजूझना...