उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में गंगा किनारे एक गांव है रानीगंज । उस गांव के उत्तरी छोर पर एक विशाल सेमर का वृक्ष है। बड़े बूढ़े उसे भुतहा कहते थे। उसकी डालियां करीब चालीस पचास मीटर तक फैली थीं। जड़ें भी बहुत मजबूत, तने से आगे की ओर विस्तार लिए हुए। बहुत सारे पक्षी उसकी कोटरों में आश्रय लिए हुए थे। पास से ही गांव की ओर आने वाली सड़क गुजरती थी। दिन में तो मजबूरीवश राहगीर उस रास्ते आते जाते पर शाम के धुंधलके के बाद उधर अकेले न कोई जाता ओर न कोई आता। बहुत आवश्यकता पड़ने पर गांव के ही दो लोग साथ जाते और जाने वाले को सेमर पार करा कर वापस चले जाते। उधर के गांव के लोग भी ऐसा ही करते। कई बार तो ऐसा हुआ कि जब कोई अनजान व्यक्ति उधर से गुजरता तो सेमर से अजीब अजीब आवाजें सुनाई देती हैं और ऐसा लगता कि कोई उसका पीछा कर रहा है और उससे लहसुन मांग रहा है। कुछ को लहसुन के साथ कलम की भी मांग सुनाई देती। घबराकर आदमी भागना शुरू कर देता और बाद में जहां भी जाता, लोगों को अपनी आपबीती सुनाता जिसे सुनकर लोग और डर जाते। आसपास के सभी गांवों में यह बात फैल चुकी थी। डर के मारे लोग अपने पास लहसुन और कलम रखने भी लगे कि कभी अगर मामला फंस गया तो लहसुन और कलम दे कर पिंड तो छूटेगा। कुछ लोग तो लहसुन के कुछ दाने वहां से गुजरते समय ऐसे ही गिरा देते की पुकारने का झंझट ही क्यों रखना, हां कलम थोड़ी मंहगी थी अतः उसे बचा कर रखते। सड़क के पास लहसुन की कलियां ऐसे ही बिखरी हुई मिलती जो समय आने पर अंकुरित हो गई थीं। उन्हें देख कर लोग समझ जाते की लहसुन मांगने वाला स्थान यही है।
बहुत से ओझा गुनिया भी उधर से गुजरते पर वे समझ ही न पाते की माजरा क्या है क्योंकि लहसुन और कलम मांगने वाला भूत उन्होंने पहली बार सुना था, हां, कलम से यह तो साबित हो रहा था कि यह कोई पढ़ा लिखा भूत है, पर लहसुन का वह क्या करेगा, यह पूरी तरह उनकी समझ से परे था। आस पास के गांवों में सुरती चूना मांगने वाले भूत तो अवश्य थे, पर लहसुन और कलम मांगने वाला भूत इकलौता यही था। लोग सवाल करते कि अगर यह भूत पढ़ा लिखा है तो कलम के साथ कागज मांगता, कापी या कोई डायरी ही मांग लेता ताकि अगर चाहे तो अपनी दिनचर्या लिख सके पर कलम के साथ लहसुन का तो कोई मेल ही नहीं था। यह बड़ा सवाल था।
सेमर के वृक्ष के आस पास पतहर की बड़ी बड़ी कतारें उग आई थी क्योंकि बरसों से उनकी कटाई छंटाई नहीं हुई थी। जंगली झाड़ भी उग आए थे। कौन छंटाई करता, किसको अपनी जान प्यारी नहीं थी, अतः उधर कोई जाता ही नहीं था। ऐसे ही दिन महीने साल गुजरते जा रहे थे। भारत को स्वतंत्र हुए अभी दस पंद्रह साल ही हुए थे। देश में नए संस्थान खुलने लगे थे। बोकारो जसे शहरों के कल कारखानों में नौकरियां मिलने लगी थी। गांव के एक दो परिवार भी वहां जा चुके थे। अन्य लोग भी बंबई इत्यादि जा रहे थे। करीब दस साल और बीत गए पर इस भुतहा सेमर से आती आवाजों का राज पता न चल सका।
गर्मियों की छुट्टियां होने पर बोकारो से नन्हें सिंह अपने बच्चों और पत्नी को लेकर गांव आ रहे थे। शाम के पांच बजे चुके थे, बस से उतरने के पश्चात अटैची सामान लेकर गांव की ओर बढ़ चले। उनके बच्चे अब अंग्रेजी स्कूल में पढ़ रहे थे, बड़ा बेटा नवल नवीं कक्षा में था और छोटा पांचवीं में। सेमर के पास से गुजरते ही उन्हें वही आवाजें सुनाई दीं, जिसपर नन्हें सिंह और उनकी पत्नी ने चिरपरिचित अंदाज में अपनी पर्स में रखे लहसुन के दाने गिराने शुरू कर दिए और बच्चों ने कलम। कुछ देर बाद घर पहुंचे। छोटा बेटा तुरंत पड़ोस में मिलने चला गया पर उनका बड़ा बेटा नवल न जाने किस सोच में गुम था।
थोड़ी देर बाद उसने पिता से कहा, “पापा, मैं उस आवाज का अर्थ समझ गया हूं, “लिसेन, कॉल माई वाइफ”, “लिसेन, कॉल माई वाइफ, शायद वह आवाज मुझसे ऐसा ही कुछ कह रही थी”। “वह आवाज लहसुन और कलम नहीं मांग रही बल्कि अपने परिवार को बुलाने की बात कह रही है”।
पिता ने उसे बड़ी जोर से डांट, क्या बकवास करते हो, खाना खाओ और चुपचाप सो जाओ, तुम थके हुए हो”।
नवल सो तो गया पर रात भर उसे नींद नहीं आई। वह आवाज बार बार उसके कानों में गूंज रही थी। इतना स्पष्ट कातर आग्रह कोई कैसे भूल सकता है?
अगली सुबह जब उसके दोस्त उससे मिलने आए तब भी वह उसी आवाज के बारे में सोच रहा था। दोस्तों के पूछने पर उसने जो मन में था सब बता दिया। उसके दोस्त उस पर हंस पड़े। पूछा, “अगर वह भूत कुछ कहना चाहता है तो हिंदी या भोजपुरी में क्यों नहीं बोल देता, अंग्रेजी क्यों बोलता है, क्या विलायती भूत है? हा! हा! हा!”
उसने कागज पर लिख उन्हें समझाना चाहा की लोग अंग्रेजी शब्द “लिसन” को लहसुन समझ रहे है और “कॉल माई वाइफ” को ‘कलम’ जबकि यह सब उसने अपने कान से स्पष्ट सुना है। वह जो भी है वहां अपने परिवार को बुलाना चाहता है पर वह अंग्रेजी में ही क्यों बोल रहा, इस बात का जवाब उसके पास नहीं था। धीरे धीरे यह बात अन्यत्र भी फैल गई पर कोई भी नवल की बातों पर विश्वास नहीं कर रहा था। उसकी छुट्टियां भी खत्म होने को थीं और उसे समझ नहीं आ रहा था कि किया क्या जाए।
बोकारो पंहुचने पर भी वह अंदर ही परेशान ही रहा क्योंकि वह आवाज जो उसके मन मस्तिष्क में घर कर गई थी और कभी कभी नींद में भी सुनाई देती। पढ़ाई में मन नहीं लग रहा था। उसके स्कूल में ही चर्च था। उसने वहां के पादरी फादर पैट्रिक को पूरी बात बताई। उन्होंने कहा, “यह हो सकता है कि वह जो भी है भोजपुरी या हिंदी न जानता हो, कोई साउथ इंडिया का हो, क्योंकि अगर साउथ का होगा तो हिंदी कैसे बोलेगा?”
बात सही थी, “पर यह पता कैसे चलेगा कि वह कौन है?”, उसने फादर पैट्रिक से पूछा।
“उससे बात करनी होगी, अगर वह वास्तव में अपने परिवार से मिलना चाहता है तो वह कौन है, अवश्य बताएगा।”
“पर बात करेगा कौन?”, उसने पूछा
“तुम”। यह सुनकर नवल डर गया। “मैं अकेले, ना, मुझसे नहीं होगा फादर”
“डोंट वरी, नथिंग विल हैपन, बस बात ही तो करनी है, और चाहो तो यह छोटा टेप रिकॉर्डर ले जाओ, किसी बड़े को भी साथ ले लेना”। इधर नवल की जाड़े की छुट्टियां होने वाली थीं । अब प्रश्न यह था कि उसके साथ चलेगा कौन?
गांव पंहुचने पर उसने जोखन चाचा से संपर्क किया जो पास के ही स्कूल में शिक्षक थे और मिडल पास थे। वह अक्सर कुछ टूटी फूटी अंग्रेजी में बोलते जिससे उनका इंप्रेशन गांव में अच्छा रहे इस कारण लोग उन्हें पढ़ा लिखा समझते थे।
अंततः बात तय हो गई। उसी रात आठ बजे नवल आगे आगे और जोखन चाचा पीछे पीछे भुतहा सेमर के पास पंहुंचे। जोखन चाचा के हाथ में टेप रिकॉर्डर था। उनके पंहुंचते ही आवाज गूंजनी शुरू हो गई।
“लिसन, कॉल माई फैमिली, लिसन, कॉल माई फैमिली”,
और तब नवल ने डरते डरते कहा, “हू आर यू , टेल मी?” जोखन चाचा भी कुछ कुछ समझने लगे थे और अब बस सुने जा रहे थे। उधर से अंग्रेजी में आवाज आई, “आई एम वाल्टर स्मिथ”, “मैं वाल्टर स्मिथ हूं, सन अठारह सौ सत्तावन से यहां दफन, मैं गंगा नदी का सर्वे कर रहा था। माहौल बिगाड़ने पर बलिया के राष्ट्रवादियों ने मेरी हत्या कर मुझे इस सेमर तले दफना दिया, मेरे परिवार वालों को मेरी कोई खबर नहीं, तबसे मैं लोगों से उन्हें सूचना देने के लिए कहता हूं पर कोई मेरी सुनता नहीं!”
“तुम कहां के हो, अपना पता बताओ?” उसने अंग्रेजी में पूछा।
“लंदन, उनतीस, पीकाडील्ली लेन”
तभी नवल ने देखा कि रास्ते के उस ओर से कोई आ रहा है, इसलिए अब उन्हें निकलना चाहिए। उसने चाचा से धीरे से कहा, “टेप बंद करिए और निकलिए” पर इधर जोखन चाचा ने टेप ऑन ही नहीं किया था तो बंद क्या करते। दोनों जल्दी जल्दी घर लौट आए।
अंततः भूत का राज खुल चुका था। घर आकर उसने चाचा से टेप आन करने को कहा पर टेप में कुछ हो तब ना। वह हताश हो गया। पर इतना निश्चित था कि वह अब वाल्टर स्मिथ के भूत की मदद करना चाहता था। उसकी आवाज में एक दर्द था जो किसी को भी मजबूर कर सकता था। मुक्ति के लिए छटपटाती एक आत्मा आज उससे संवाद कर रही थी और अब नवल ही अब उसकी इकलौती उम्मीद बन गया था। बोकारो पंहुचने पर फादर पैट्रिक के सहयोग से उसने दो पत्र लिखे, एक ब्रिटिश उच्चायोग को तो दूसरा वाल्टर स्मिथ के परिवार को और पोस्ट कर दिए। पावती में फादर पैट्रिक का पता दे दिया। पत्र के पंहुचने पर ब्रिटिश उच्चायोग ने तो कोई ध्यान नहीं दिया पर कुछ दिनों बाद वाल्टर के परिवार जनों ने सर पैट्रिक से संपर्क साधा। उन्होंने नवल से बात की तो चीजें स्पष्ट हो गईं। ब्रिटिश सरकार के रिकार्ड खंगाले गए तो पाया गया कि सरकार वाल्टर स्मिथ को गुमशुदा दर्ज कर चुकी थी। अब वाल्टर स्मिथ के परिवार में बस उसके नाती पोते ही बचे थे जो बड़े हो चुके थे।
कुछ दिनों बाद वाल्टर स्मिथ का परिवार उस सेमर के वृक्ष के नीचे खड़ा था और आस पास के गांवों का जनसमूह उस मुक्तियज्ञ को देख रहा था। ब्रिटिश उच्चायोग की गाडियां आस पास खड़ी थी और प्रशासन जनसमूह को नियंत्रित करने में लगा था। न्यूज वालों की चहलकदमी बढ़ गई थी। जमीन खोदी गई तो वहां वाल्टर स्मिथ के अवशेष मिले। पास ही कुछ स्केल और एक पीतल का कंपास मिला जो उसके सर्वेयर होने का सबूत दे रहा था। फादर पैट्रिक ने वाल्टर के मुक्ति हेतु सभी विधियां संपन्न कराई और उसकी अस्थियों को ले जाकर पास के ही मसीही कब्रिस्तान में दफन करा दीं। वाल्टर स्मिथ का परिवार नवल को धन्यवाद दे रहा था और चारों ओर उसकी चर्चा हो रही थी। समाचार वाले उसकी तस्वीर ले रहे थे।
तभी उसके कानों में वाल्टर स्मिथ की आवाज गूंजी, “थैंक्स फ्रेंड, यू डिड इट, गुड बाई, ब्लेस यू” और फिर वह आवाज न जाने कहां गुम हो गई। लहसुन और कलम मांगने वाले भूत का कहीं कोई अता पता नहीं था। भुतहा सेमर अब भी अपनी विशालता लिए खड़ा था। नवल को अब जाकर सुकून मिला था कि उसके प्रयास से वाल्टर स्मिथ की तड़पती आत्मा को मुक्ति मिल गई थी।