मेरे गांव में एक अनबोलता बाबा जी ने कुछ दिनों पहले ही पदार्पण किया था। उनके द्वारा कथावचन का पोस्टर देखकर लोग अचंभे में पड़ जा रहे थे क्योंकि कथावचन शब्द ही अनबोलता शब्द के शाब्दिक अर्थ से एकदम अलग होता है। तफ्तीश करने पर लोग बता रहे हैं कि ये अनबोलता बाबा तभी बोलते हैं जहां पूछे गए प्रश्न धर्म को बढ़ावा देते हों, और अगर किसी ने इधर उधर के सवाल पूछे तो अनबोलता जी मौन धारण कर लेते हैं क्योंकि वे सवाल उनके हिसाब से गैर जरूरी हैं और धर्म को क्षति पहुंचाते हैं। इस कारण उनका नाम अनबोलता बाबा पड़ गया है।
उनके बारे में तरह तरह की किंवदंतियां चर्चा में हैं। सुनने में आया है कि वे इसी गांव के दूसरे टोले के हैं। उनके सहपाठी ने उनकी युवावस्था से जुड़ी एक बात मुझे अभी बताई है। वह बता रहा था कि अनबोलता जी प्रारंभ में ऐसे नहीं थे। यह सुनकर मैं चौंक गया। अधिक कुरेदने पर यह पता चला यह अनबोलता जी अपने बचपन से ही बड़े तर्कशील थे और गाहे बगाहे पंडितों से शास्त्रीय मंत्रों का अर्थ पूछा करते थे। उनके प्रश्नों से पंडित लोग अक्सर सकपका जाते और कोई तर्कपूर्ण उत्तर नहीं दे पाते। कई बार लोगों ने उनकी आदत को लेकर उन्हें टोका भी था। कई वर्षों बीत जाने पर भी उनमें कोई सुधार नहीं हुआ था। जैसे तैसे उनकी शादी तय हुई क्योंकि वे कोई काम धाम तो करते नहीं थे। उनके बाबा और पिता ने काफी हिदायत देकर उन्हें तिलक की वेदी पर बिठाया कि पूजा होते समय अपना मुंह बंद रखना और बस अपना सिर हिलाना, कुछ पूछ मत पड़ना नहीं तो लड़की वालों को तुम्हारी इस आदत का पता चल जाएगा। कहीं शादी न टूट जाए क्योंकि बड़ी मुश्किल से तो रिश्ता तय हुआ है। अंततः तिलक शुरू हुआ, पंडित जी मंत्रोच्चार कर रहे थे और उनसे हामी भरवा रहे थे। पंडित जी ने जब उन्हें ‘विष्णु स्वरूप वर’ कह कर संबोधित किया तो अनबोलता जी को लगा कि वे सातवें आसमान पर पहुंच गए। अब वह चुप कैसे रहें? इतनी चुप्पी तो उन्होंने कभी अपने जीवन में धारी नहीं थी। किसी तरह अपने को मैनेज कर चुप चाप बैठे रहे पर जब तिलक की विधि खत्म हो गई तो अपने बाबा से पूछ पड़े, “बाबा, अब पूछें न?”। उनके बाबा हैरान, वे कहें क्या पर इतने लोगों के सामने कहीं भेद खुल न जाए इसलिए उन्होंने हामी भर दी। फिर क्या था, अनबोलता जी ने पंडित जी से तिलक के मंत्रों के अर्थ और औचित्य पूछ डाले। माहौल गंभीर हो गया, इधर पंडित जी उग्र हो गए क्योंकि इसकी तो उन्होंने कभी कल्पना ही नहीं की थी। वे वधू पक्ष के रिश्तेदार भी थे। अपने पढ़े गए मंत्रों की व्याख्या पर तो उन्होंने कभी ध्यान नहीं दिया था अतः उत्तर कहां से देते। मन तो हो रहा था कि वे अनबोलता जी के गाल पर दो चार चांटे जड़ दें पर अभी यह करना ठीक नहीं था। अनबोलता जी उन्हें मौन देखकर इतना बोले, इतना बोले कि लड़की वाले नाराज हो गए। पंडित जी ने भी खूब आग में घी डाला और अपने मुखारविंद से “घोर अपमान! घोर अपमान!” दो तीन बार चिल्लाए। हंगामा बढ़ गया। फिर क्या, शादी टूट गई। पंडित जी ने जाते जाते उन्हें मार्क्सवादी, पागल इत्यादि की संज्ञा दे डाली। अनबोलता जी को अपने अति तार्किक प्रश्नों का उत्तर तो उन्हें नहीं मिले पर एक सीख अवश्य मिली कि कभी भी धर्मशास्त्रों पर प्रश्न उठाना बड़ा घाटे का सौदा है। इस घटना से उन्हें यह अनुभव हुआ मुक्त चिंतन और बोलने की प्रवृति बड़ी ही घातक है जिसपर नियंत्रण होना ही चाहिए।
इसी उधेड़बुन में करीब दो महीने बीत गए। उन्होंने एक अनिश्चित मौन धारण कर लिया था। घर वाले भी उनसे बात करने में कतरा रहे थे। पिता यह मान चुके थे कि अब इनका विवाह संभव नहीं है।अनबोलता जी के लिए उनका विवाह संबंध टूट जाना एक सदमे से कम नहीं था। उनके सेल्फ में रखीं तर्कशील चिंतन की किताबें किसी काम की साबित नहीं हुई थीं। मार्क्स का ‘द कैपिटल’, फ्रांसिस बेकन का ‘नौवम ऑर्गेनम’ और कौटिल्य का ‘अर्थशास्त्र’ इत्यादि अन्य जो भी किताबें उन्होंने पढ़ी थीं वे सब आज बेकार लगने लगीं थीं। कुछ उपनिषदों का अध्ययन भी उन्होंने किया था।वास्तविकता में इन किताबों का अध्ययन उनके किसी काम न आया था। वे नितांत अकेले पड़ गए थे। उधर पंडित जी अपने अपमान से अभी तक उबर नहीं पाए थे। वह लोगों के बीच इनको कितनी भी गालियां दे लें पर लोगों को उनके शास्त्रों के ज्ञान पर संदेह तो अवश्य हो गया था। जगह-जगह लोग यह कहने लगे थे कि उन्हें कुछ भी आता जाता नहीं है। पंडित जी के विरोधी भी कुछ कम नहीं थे। उनके मिथ्या प्रचार के कारण लोगों ने उन्हें पूजा पाठ के लिए बुलाना भी कम कर दिया था। पंडित जी मन ही मन अनबोलता जी को कोस रहे थे । तभी एक दिन अचानक अनबोलता जी पंडित जी से क्षमा मांगने पहुंच गए। पंडित जी आश्चर्यचकित। मन ही मन डर भी रहे थे कि पता नहीं अब क्या पूछने आ गया है? पर थोड़ी देर के बाद उनका यह भ्रम जाता रहा और उस दिन यह बात तो तय हो गई कि अब अनबोलता जी और पंडित जी में कोई दुराव नहीं रहेगा। अब वे कभी भी धर्म के विषयों पर सवाल नहीं उठाएंगे और जहां कहीं पंडित जी मिलेंगे उनके आगे दंडवत भी करेंगे। बस एक आग्रह था कि पंडित जी उनका विवाह कहीं करा दें। पंडित जी ने सहर्ष इसे स्वीकार कर भी लिया। इस समय वे दोनों एक दूसरे के पूरक मालूम हो रहे थे। सभी को लगा कि मामला खत्म हो गया पर सही अर्थों में तो मामला अब शुरू हुआ था।
पंडित जी बड़े ही दूरदर्शी थे। वह अनबोलता जी की हाजिर जवाबी और तर्कशील बुद्धि से बड़े प्रभावित थे इसलिए वह मौन होकर कुछ और सोच रहे थे। अभी कुछ दिनों पहले ही उन्हें बहुत दिनों के बाद कथा वाचन करने का आमंत्रण मिला था। उनके अंदर इतना ज्ञान तो था नहीं कि वह लोगों के प्रश्नों का समुचित जवाब दे पाते। ऐसी परिस्थिति में उन्होंने अनबोलता जी को लॉन्च करने का सोचा। उन्हें पूर्ण विश्वास था किया यह तर्कशील बालक अगर व्यास गद्दी पर बैठ जाए तो लोगों के प्रश्नों का कोई ना कोई उत्तर तो दे ही देगा भले ही इसे धर्म पर उतना विश्वास नहीं है। उसकी मदद करने के लिए मैं वहां रहूंगा ही। टीम स्पिरिट से तो असंभव कार्य भी संभव बनाया जा सकते हैं, और अगर कुछ इधर-उधर हो भी गया तो वे जैसे तैसे मामले को दबा ही लेंगे।
बस फिर क्या था, अगली कथा में अनबोलता जी व्यास गद्दी पर बैठे हुए मिले और पंडित जी उनके पास ही गायकों की मंडली का नेतृत्व करते हुए। अनबोलता जी ने अपना स्वरूप भी अपग्रेड कर लिया था, गेरूआ वस्त्रों में गले में रुद्राक्ष की माला पहने और माथे पर त्रिपुंड लगाए उनका स्वरूप बड़ा ही दैदीप्यमान प्रतीत हो रहा था। उनके आसपास पंडित जी के कुछ लोग हरदम तैनात रहते । प्रश्न भी ऐसे ही पूछवाए जाते जिनके उत्तर पहले से ज्ञात हों। और अगर कहीं कोई कठिन प्रश्न आते तो अनबोलता जी एकाएक कुछ इशारा करके मौन हो जाते जैसे मन ही मन में अपने आराध्य से बातें करने लगे हों। अभी कुछ दिनों पहले ही जब उन्होंने मंगल ग्रह पर गणेश जी की मूर्ति मिलने के बारे में भक्तों को बताया था तब कुछ लोगों ने इसपर संदेह व्यक्त किया था। संदेह उपस्थित होते ही बाबा जी ने मौन धारण कर लिया और करीब पंद्रह मिनट के अंतराल पर उन्हें कल कथा के दौरान मंगल ग्रह पर गणेश जी की तस्वीर दिखाने का वादा कर दिया। अगले दिन जब कथा प्रारंभ हुई तो गणेश जी की तस्वीर मंगल ग्रह पर बड़े बड़े टी वी स्क्रीन पर दिखाई दे रही थी जिसके नीचे सबटाइटल्स में नासा की ओर से तस्वीर खींचे जाने की बात लिखी थी। और पुख्ता करने के लिए वहां के राष्ट्रपति ट्रंप का ट्वीट भी टी वी स्क्रीन पर दिखाई दे रहा था। यह देख भक्तों की सारी जिज्ञासा शांत हो गई थी। इधर पंडित जी उनसे अनबोलता बाबा जी जय जयकार कराने में दल बल के साथ लगे थे। उनकी बोलने की शक्ति से अधिक कारगर तो उनकी प्रश्नों पर मौन रहने की कला साबित हुई थी। भक्त लोग इस मौन को एक विलक्षण गुण मानने लगे थे और इस कारण वे अनबोलता बाबा के रूप में प्रसिद्ध हो गए। लोग उनकी प्रशंसा करते न थकते, कि बाबा जी धर्म के खिलाफ कोई बात नहीं सुन सकते और अपने मौन से उस नकारात्मकता का एक जोरदार उत्तर दे देते हैं। धीरे धीरे धर्म के क्षेत्र में उनकी ख्याति फैलने लगी और भक्तजनों की संख्या भी बढ़ने लगी।
पंडित जी उनके प्रधान सेवादार के रूप में सुशोभित थे। उनकी पौ बारह हो गई थी। जगह जगह अनबोलता आश्रम के लिए जमीन खरीदी जा रही थी और वे आश्रम की फॉर्च्यूनर गाड़ियों में अपने दल बल के साथ घूमते मिलते। वे जहां भी जाते भक्त साष्टांग दंडवत कर गाड़ियों के आगे लेट जाते। कई बार तो नेता भी लेट जाते। बड़े-बड़े पुलिस अधिकारी भी मलाईदार ओहदों पर अपने ट्रांसफर पोस्टिंग के लिए अब पंडित जी से मिलने लगे थे। अनबोलता जी की कथा में वैज्ञानिक चिंतन या तर्कों की कोई पुकार नहीं सुनी जाती थी क्योंकि उसकी आवश्यकता ही नहीं थी। अगर दूर कहीं नेपथ्य से कोई शोर गूंजता था कि, “नया जमाना है भाई, खेल नहीं है” तब अनबोलता जी एकदम चुप हो जाते हैं क्योंकि अनबोलता होने का अभिनय शुरू हो चुका होता। तब पंडित जी और उनके मातहत नेपथ्य से गूंजते उस शोर से दुगुनी आवाज में चिल्लाना शुरू कर देते हैं कि” धर्म है भाई, खेल नहीं है ” जिससे नेपथ्य का शोर किसी को सुनाई नहीं देता। सब कुछ उसी कोलाहल में दब जाता। उनके आश्रम के आस पास की सिक्योरिटी चाक चौबंद की जा रही थी क्योंकि चुनाव नजदीक आ रहे थे और चुनाव के दौरान नेताओं का जमावड़ा आश्रम में बढ़ने वाला था। सभी को लगने लगा था कि अनबोलता बाबर एक अवतारी पुरुष हैं। उनके आदेश के बिना आश्रम में कोई पत्ता नहीं हिल सकता था ।आप उनके विरोध में कुछ बोले नहीं की उधर आप हाउस अरेस्ट हो सकते थे। अनबोलता जी को देखकर बहुत से अन्य नेता और महंत भी वैसा ही बनने का प्रयास कर रहे थे। ए आई की मदद से वह मिनटों में यह पता लगा सकता थे कि इस इलाके में धर्मद्रोही कितने हैं, और फिर सोशल मीडिया पर उनकी धुलाई…आप समझ ही रहे होंग। एक बहुत बड़े नेता अनबोलता धाम का नाम एक नए स्टार्टअप के रूप में लेने लगे थे। उनके अनुसार धर्म एक नए रोजगार सेक्टर के रूप में उभर रहा है और भविष्य में इसमें और उछाल आ सकता है। अनबोलता जी, पंडित जी और उनके कई मातहतों ने इस स्टार्टअप के जरिए अपनी बेरोजगारी बड़े एडवांस तरीके से हल कर ली थी। कुछ इधर उधर या ऊंच नीच हो जाती तो अदालत उनके सामने नतमस्तक हो जाती क्योंकि उनसे संबंधित सभी मामले धर्म के मामले थे, और धर्म के मामले खेल नहीं होते हैं, यह तो शाश्वत सत्य है।
उनकी सफलता को देख कर बहुत से नौजवान धार्मिक बनने लगे थे, तिलक त्रिपुंड लगाने लगे थे । मंगलवार को हनुमान जी की शरण में रहने वालों और शनिवार को शनि भगवान को तेल अर्पित करने वालों की संख्या में खासी बढ़ोत्तरी हो गई थी। गेरूआ वस्त्रों की बिक्री बढ़ गई थी और कई रेडीमेड परिधानों पर “अनबोलता धाम सरकार की जय” पहले से ही अंकित रहता था। भक्तिमार्ग ही सबसे श्रेष्ठ मार्ग है, यह नौजवानों की श्रद्धा को देखकर सिद्ध होने लगा था। विज्ञान की कक्षा में बैठने वालों की संख्या लगातार घट रही थी। यह देख कर कई विज्ञान के प्रोफेसर भी अनबोलता बाबा की शरण में आने लगे थे। मेरा गांव अब अनबोलता नगर के रूप में नेशनल चैनलों पर प्रचारित किया जाने लगा था और गांव वाले उनकी कथा में प्रसाद ग्रहण कर धन्य हो रहे थे। बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा एवं लोकतंत्र के प्रश्न इस भक्तिमार्ग पर आते ही जैसे विलुप्त हो जाते क्योंकि उन्हें कोई भी तरजीह न देता था। महाकुंभ में मोक्ष प्राप्ति के नए नए तरीके और उपादान बताए जा रहे थे, धर्म की मादकता में सारा समाज डूब चुका था, हां, यह तो किसी को याद ही नहीं था कि कार्ल मार्क्स ने ही धर्म को अफीम के नशे की संज्ञा दी थी। ।
यह सब तो मैने अपने गांव में देखा, आपके शहर में अनबोलता बाबा की क्या चर्चा है, मिलने पर बताइएगा।मैने भी पंडित जी से एक गेरूआ चोला प्राप्त किया है, उसे पहन कर निकलने के बारे में सोच रहा हूं। कम से कम उनका ग्रामवासी को तो हर समय गेरूआ चोले में दिखना ही चाहिए, है कि नहीं?