इन ऊंचे नीचे रास्तों मेंमंजिलों के वास्तों मेंकोई प्रियतम आन मिलताकोई प्रिय सहसा बिछड़ता। कभी उत्थान का आनंद हैकभी गर्दिशों की शाम हैचलते ही जाना जिंदगी हैपल भर नहीं विश्राम है? मार्ग का आकर्ष सबकोऔर आगे खींचता हैक्षितिज का हर बिंब नूतनकदमों को मेरे तौलता है। हर नदी श्वेतांबरा सीअपनी गति से दर्श देतीएक ताजगी सी जागती हैजब भी कोई पवन चलती। कंटको का क्या भरोसाकब पगों को बेध देंगेखाईयों का क्या...
अरदास
समय के वेग में यूं बढ़ गए कदमयाद ही ना रहा प्रेम कहना है कबतुम सामने से कुछ यूं ओझल हुएहोश ही ना रहा संजोना है कब? वश में था ही नहीं थाम लें वक्त कोमांग लें, गढ़ ही लें मुकद्दर नयारोक लें हम तुम्हें भर के आगोश मेंथा पता ही नहीं दूर होना है क्या? ओस का ओज ज्यो घास में बुझ गयाजैसे थम सा गया समंदर कोईफूल की डाल से पुष्प जैसे गिरेटूट गिरता है ज्यों तेज तारा कोई। ठीक वैसे गए तुम मुझे छोड़ करयह लगा ही...
मौसम
पिछला मौसम बीत गयाथा वह कितना अपना साबस कुछ डालों पर फूल न थेपर था वह कितना सपना सा। पिछले मौसम में हमने कितनेकलियों पर अपना दिल हारापिछला मौसम ही मौसम थाभंवरे रस पीकर मदमस्त हुए। पिछले मौसम में हमने तेरेबालों को बदली मान लियापिछला मौसम में ही तुमनेकजरारे अपने नैन किए। पिछले मौसम में कोयल नेअपने मन की बात कहीमधु के गुच्छे डालो पर लटकेअमिया से अनुबंध हुए। पिछले मौसम में हमनेगीतों में सब कुछ लिख...
नेहवा लगा के(भजन)
नेहवा लगा के राम कहां चलि गइलsअयोध्या में आ के राम कहां चलि गइलs?हमके बोला के राम कहां चलि गइलsमर्यादा सिखा के राम कहां चलि गइलs? सुनिले बैकुंठे में तोहार ठेकान बासुनिले कि क्षीरसागर बहुते कमाल बामनई रूप आ के राम कहां चलि गइलsरहिया देखा के राम कहां चलि गइलs? इंहां बाट जोहत तोहर केतना जुग बीतलअवध राम बिन जैसे सोना भईल पीतलदरस देखा के राम कहां चलि गइलsहमके बोला के राम कहां चलि गइलs? सून सब मंदिर...
जिनिगिया (भजन)
सहेजत जिनिगिया थक गइल जान रेछूटि जाई एक दिन सब रिश्ता नातान रे?जरि जाई रसरी टूटी सब गुमान रेजाने कब शिव सुनब हमरो पुकार रे?देखीं कब आवेलs हमरे दुआर रे? जोहत तोहर बाट राम बीती गईल जिनगीघुमलीं बहुत मंदिर घाट पहिन के हम पियरीकरत भजनिया लेत तोहर नाम रेतोहारे से मर्यादा बा तोहरे से मान रेदेखीं कब आवेलs हमरे दुआर रे? जवानी के दिनवां में कहां होश होलाआंखी से सोझे राहि उल्टा बुझालामनई बुलबुला अइसन...
मैं कवि हूं
मैं कवि हूं सिर न झुकाऊंगामैं झूठा यश न कमाऊंगाजो देख रहा हूं आंखों सेकविता में लिखता जाऊंगामैं कवि हूं सिर न झुकाऊंगा। लेखन ही सत्कर्म मेरादर्पण बनना है धर्म मेराभले कोई मुझसे विलग रहेनिर्बल का साथ निभाऊंगामैं कवि हूं सिर न झुकाऊंगा। अपनी कोई अभिलाष नहींहै मन में कोई त्रास नहींएक देह मिली, एक देश मिलाजिसकी पीड़ा मैं गाऊंगामैं कवि हूं सिर न झुकाऊंगा। किस तरह छोड़ दूं अपनों कोशोषण के अंधियारे...
ओ प्रियतमा
आओ मेरे पास आओ प्रियतमाअपनी खुशबू से मिलाओ प्रियतमाजानता मनुज मैं बेकार सा मैं हूंतुम मुझे चंदन बनाओ प्रियतमा। यूं तो फूलों पर बहुत से रंग आएभ्रमर के गीत भी कलियों को भाएजो फागुन के रंगो में होता सम्मिश्रणतुम वही मुझको लगाओ प्रियतमा। मैं वक्त को गजलें सुनाता रह गयातेरे रूप को भी ठीक से देखा नहींआज जागी मेरे मन की हररितिमातुम जिंदगी मेरी सजाओ प्रियतमा। संसार में मुझसा अनूठा कौन हैतुम जो पारस से...
मधुशाला
रातें कट गई गजलों में मेरीगीतों में दिवस बीत गएतेरी यादों में खो गया जबसेआज कितने बरस बीत गए। छेड़ दिया मन का तार फिरउस राग की तरन्नुम नेतेरी तलाश में फिरते हुएखुशबू के शहर रीत गए। तेरा साथ, रंगीली शामफिर लौटकर न आएगीकोशिशें लाख हों भुलाने कीदिल से अब याद कहां जाएगी? तुम मुझे सोचते होगेकिसी अनजान से शहर मेंमैं कविता में ढूंढता तुमकोतू मेरी मधु है, मधुशाला भी। जो फूलों और कलियों मेंखुशी का रंग...
पथिक
उठो भूमि पर पड़े पथिक तुमआगे बढ़ने के मतवालेबस कदमों के थक जाने सेराही नहीं रुका करते हैं। चलो क्षितिज की और चलेंआंधी का रुख मोड़ चलेंतूफानों के आ जाने परलक्ष्य नहीं बदला करते हैं। बस साधन है थकन तुम्हारीदृष्टि साध्य पर तानो फिर सेमन से हारे नहीं अगर होकौन तुम्हे हारा कहते हैं? जीवनलीला यह क्षणभंगुरदो पल का ही मेला साराकुछ फूलों के मुरझाने परउपवन कहां कभी रोते हैं? भले बिजलियां टूट पड़ेंघिर आएं...
मुस्कान
राह पर प्रस्थान फिर फिरमार्ग का अनुमान फिर फिरधूप हो या छांव फिर फिरगेह का निर्माण फिर फिर। कर नमन इन बाजुओं कास्वेद का कर दान फिर फिरकर्म पथ पर फिर भरोसाप्रारंभ हो श्रमदान फिर फिर। बस यही तो जिंदगी हैप्राप्ति का अरमान फिर फिरलक्ष्य पर संधान फिर फिरप्रेम का सम्मान फिर फिर। गर्दिशों की शाम जो होसुन ग़ज़ल की तान फिर फिरमरू हो या गुलशन कोई होनीड़ का निर्माण फिर फिर। ले मधु का जाम फिर फिरकर खुशी का...