पिछला मौसम बीत गयाथा वह कितना अपना साबस कुछ डालों पर फूल न थेपर था वह कितना सपना सा। पिछले मौसम में हमने कितनेकलियों पर अपना दिल हारापिछला मौसम ही मौसम थाभंवरे रस पीकर मदमस्त हुए। पिछले मौसम में हमने तेरेबालों को बदली मान लियापिछला मौसम में ही तुमनेकजरारे अपने नैन किए। पिछले मौसम में कोयल नेअपने मन की बात कहीमधु के गुच्छे डालो पर लटकेअमिया से अनुबंध हुए। पिछले मौसम में हमनेगीतों में सब कुछ लिख...
माटी के लोगवा
माटी के लोगवा, रहि गईलें झोपड़िये मेंसेठ साहूकार लूटि गईलें रे बिदेशिया। खेतवा में सब दिन, खटेला जे मारे मारेकेहू ओके सुधियो ना लिहलें रे बिदेशिया। सबके अटरिया बनत गईलें दसो मालागरीबन के बतिया भूलईलें रे बिदेसिया। जेठ दुपहरिया में तियना बेचत रहेबुढिया नयन भरि लोर रे बिदेसिया। छोटे छोट लईका कागजे बीनत देखलीं होकहला पर केहू ना पतियाई रे बिदेसिया। राम के देसवा में भूखल नंगा लोग अबोगांधी के सपनवां का...
नेहवा लगा के(भजन)
नेहवा लगा के राम कहां चलि गइलsअयोध्या में आ के राम कहां चलि गइलs?हमके बोला के राम कहां चलि गइलsमर्यादा सिखा के राम कहां चलि गइलs? सुनिले बैकुंठे में तोहार ठेकान बासुनिले कि क्षीरसागर बहुते कमाल बामनई रूप आ के राम कहां चलि गइलsरहिया देखा के राम कहां चलि गइलs? इंहां बाट जोहत तोहर केतना जुग बीतलअवध राम बिन जैसे सोना भईल पीतलदरस देखा के राम कहां चलि गइलsहमके बोला के राम कहां चलि गइलs? सून सब मंदिर...
जिनिगिया (भजन)
सहेजत जिनिगिया थक गइल जान रेछूटि जाई एक दिन सब रिश्ता नातान रे?जरि जाई रसरी टूटी सब गुमान रेजाने कब शिव सुनब हमरो पुकार रे?देखीं कब आवेलs हमरे दुआर रे? जोहत तोहर बाट राम बीती गईल जिनगीघुमलीं बहुत मंदिर घाट पहिन के हम पियरीकरत भजनिया लेत तोहर नाम रेतोहारे से मर्यादा बा तोहरे से मान रेदेखीं कब आवेलs हमरे दुआर रे? जवानी के दिनवां में कहां होश होलाआंखी से सोझे राहि उल्टा बुझालामनई बुलबुला अइसन...
मैं कवि हूं
मैं कवि हूं सिर न झुकाऊंगामैं झूठा यश न कमाऊंगाजो देख रहा हूं आंखों सेकविता में लिखता जाऊंगामैं कवि हूं सिर न झुकाऊंगा। लेखन ही सत्कर्म मेरादर्पण बनना है धर्म मेराभले कोई मुझसे विलग रहेनिर्बल का साथ निभाऊंगामैं कवि हूं सिर न झुकाऊंगा। अपनी कोई अभिलाष नहींहै मन में कोई त्रास नहींएक देह मिली, एक देश मिलाजिसकी पीड़ा मैं गाऊंगामैं कवि हूं सिर न झुकाऊंगा। किस तरह छोड़ दूं अपनों कोशोषण के अंधियारे...
ओ प्रियतमा
आओ मेरे पास आओ प्रियतमाअपनी खुशबू से मिलाओ प्रियतमाजानता मनुज मैं बेकार सा मैं हूंतुम मुझे चंदन बनाओ प्रियतमा। यूं तो फूलों पर बहुत से रंग आएभ्रमर के गीत भी कलियों को भाएजो फागुन के रंगो में होता सम्मिश्रणतुम वही मुझको लगाओ प्रियतमा। मैं वक्त को गजलें सुनाता रह गयातेरे रूप को भी ठीक से देखा नहींआज जागी मेरे मन की हररितिमातुम जिंदगी मेरी सजाओ प्रियतमा। संसार में मुझसा अनूठा कौन हैतुम जो पारस से...
मधुशाला
रातें कट गई गजलों में मेरीगीतों में दिवस बीत गएतेरी यादों में खो गया जबसेआज कितने बरस बीत गए। छेड़ दिया मन का तार फिरउस राग की तरन्नुम नेतेरी तलाश में फिरते हुएखुशबू के शहर रीत गए। तेरा साथ, रंगीली शामफिर लौटकर न आएगीकोशिशें लाख हों भुलाने कीदिल से अब याद कहां जाएगी? तुम मुझे सोचते होगेकिसी अनजान से शहर मेंमैं कविता में ढूंढता तुमकोतू मेरी मधु है, मधुशाला भी। जो फूलों और कलियों मेंखुशी का रंग...
पथिक
उठो भूमि पर पड़े पथिक तुमआगे बढ़ने के मतवालेबस कदमों के थक जाने सेराही नहीं रुका करते हैं। चलो क्षितिज की और चलेंआंधी का रुख मोड़ चलेंतूफानों के आ जाने परलक्ष्य नहीं बदला करते हैं। बस साधन है थकन तुम्हारीदृष्टि साध्य पर तानो फिर सेमन से हारे नहीं अगर होकौन तुम्हे हारा कहते हैं? जीवनलीला यह क्षणभंगुरदो पल का ही मेला साराकुछ फूलों के मुरझाने परउपवन कहां कभी रोते हैं? भले बिजलियां टूट पड़ेंघिर आएं...
मुस्कान
राह पर प्रस्थान फिर फिरमार्ग का अनुमान फिर फिरधूप हो या छांव फिर फिरगेह का निर्माण फिर फिर। कर नमन इन बाजुओं कास्वेद का कर दान फिर फिरकर्म पथ पर फिर भरोसाप्रारंभ हो श्रमदान फिर फिर। बस यही तो जिंदगी हैप्राप्ति का अरमान फिर फिरलक्ष्य पर संधान फिर फिरप्रेम का सम्मान फिर फिर। गर्दिशों की शाम जो होसुन ग़ज़ल की तान फिर फिरमरू हो या गुलशन कोई होनीड़ का निर्माण फिर फिर। ले मधु का जाम फिर फिरकर खुशी का...
नई रेख रच देंगे
मैं तुम्हे पुष्प बुलाऊं, तुम कहो भ्रमर मुझकोये वही बात पुरानी, इसमें कुछ नया क्या है? तुम बनो सागर मेरे, मैं नदी बहती बेकलये वही बात पुरानी, इसमे कुछ नया क्या है? समय की लहर में यूं बह गए मानक अपनेफूल पर धूल जमी है, नदी रेत से पट चुकी कब की। सागर को इंतजार है लंबा…नदी से मिलने का!कवि गरीब सा उपमान खोजता फिरता। कोयल की कूक कहां, मैना की डाल खाली हैमहुए की महक कहां, न सरसों की चूनर धानी। वे कहते...